Saturday, May 30, 2020

फ़िल्म #Eeballayooo की समीक्षा

आज (30/05/2020) #Sensiblecinema के तहत प्रतीक वत्स द्वारा निर्देशित फिल्म Eeb Allay Ooo का यूट्यूब पर प्रीमियर देखा। इस फ़िल्म को 2019 में मुंबई फ़िल्म फेस्टिवल में रिलीज़ किया गया था। आप सोच रहे होंगे ये कैसा नाम है, इसका अर्थ क्या है, क्या ये किसी और भाषा की फ़िल्म है, तो इन सारे सवालों का जवाब है नहीं। लगभग पौने दो घंटे की ये फ़िल्म हिंदी भाषा की ही फ़िल्म है। फ़िल्म में मुख्य किरदार अंजनी का रोल निभाया है शार्दुल भारद्वाज ने, अंजनी के जीजा के किरदार में हैं शशि भूषण और दीदी के किरदार में है नूतन सिन्हा। ये फ़िल्म कहानी है उस अंजनी की जो नौकरी कर ढेर सारा पैसा कमाने की चाह लिए अपने गांव से दिल्ली अपनी दीदी के पास आता है पर धीरे धीरे उसका एक एक सपना फूटे घड़े से पानी की तरह रिसता चला जाता है। प्रतीक वत्स की ये फ़िल्म ह्यूमर, ड्रामा और इमोशंस का परफेक्ट ब्लेंड है। ये फ़िल्म हंसाते हुए कभी भावुक कर जाती है तो कभी गरीबी में जीवन जीने को अभिशप्त लोगों की पीड़ा देख गैरबराबरी पर आधारित व्यवस्था के ख़िलाफ़ गुस्सा पैदा करती है। 
फ़िल्म की कहानी कुछ यूं है कि अंजनी गांव से शहर एक अदद नौकरी की तलाश में दिल्ली अपनी बहन के पास आता है। अंजनी के जीजा जो ख़ुद किसी कंपनी में गार्ड की ड्यूटी करते हैं जैसे तैसे एक ठेकेदार को बोलकर अंजनी को दिल्ली के रायसिना हिल्स पर बंदर भगाने की नौकरी दिलाते हैं। महिंदर जिसकी कई पुश्ते ये काम करती चली आई हैं वो अंजनी को बंदर भगाने की ट्रेनिंग देता है। वो अंजनी को बताता है कि उसे ईईब... ऑले...ऊ ऊ ऊ की आवाज़ निकालकर बंदर को भगाना पड़ेगा। अंजनी बहुत प्रयास करता है पर महिंदर की तरह बंदरों को नहीं भगा पाता। वो नौकरी बचाने के लिए कभी लंगूरों के पोस्टर जगह जगह लगाता है तो कभी ख़ुद ही लंगूर के गेट अप में आ जाता है। इसकी खबर जब ठेकेदार को लगती है तो वो उसे नौकरी से निकालने की धमकी देता है और उसकी शिकायत उसके जीजा से भी करता है तो जीजा शशि अंजनी से कहते हैं: काहे जी काम ठीक से काहे नहीं करते हैं। अंजनी: कर ना रहे हैं। बंदर भगाना पड़ता है, आप भगाए हैं जी कभी। अंजनी लंगूरों भगाने के साथ साथ लोगों का मनोरंजन भी शुरू कर देता है और उसके विडियोज़ वायरल होने लगते हैं जिसके कारण उसकी नौकरी चली जाती है। लाख कोशिशों के बाद भी कोई काम नहीं मिलता। ये विडंबना ही है कि एक तरफ बंदरों को भागने के लिए लोग रखे जाते हैं और दूसरी तरफ उन्हीं बंदरों को हनुमान जी का अवतार मानने वाले कर्मचारी उन्हें रोज़ बुला बुलाकर खाने पीने की चीजें देते हैं और अगर बंदर भगाने वाला व्यक्ति उन्हें ऐसा करने से मना करे तो उसे नौकरी से निकलवाने की धमकी देते हैं। अंजनी उस वक़्त सकते में आ जाता है जब उसे पता चलता है कि उसका दोस्त महिंदर बंदर के हमले से मर गया। हमारे यहां इंसानों की ज़िन्दगी बहुत सस्ती है, गरीब आदमी कीड़े मकोड़े की तरह कब मर जाता है कोई नोटिस ही नहीं करता।
यह फ़िल्म कई गंभीर समस्याओं को सांकेतिक रूप से छूते हुए निकल जाती है जैसे गांवों से शहरों की ओर पलायन, शहर के संघर्ष, बस्तियों में रहने वाले लोगों की समस्या आदि। ख्वाबों के टूटने की टीस लिए अंजनी विक्षिप्त सा हो जाता है। 
अंजनी के किरदार को शार्दुल ने बख़ूबी निभाया है। नूतन सिन्हा और शशि भूषण जी का अभिनय भी ज़बरदस्त है। ये सारे किरदार हमें अपने आस पास के ही मालूम पड़ते हैं। टीम एफटीआईआई ने बहुत अच्छा काम किया है, तो एक बार पुनः सारी टीम को इस फ़िल्म के लिए साधुवाद।

फ़िल्म #हैदर की समीक्षा

फ़िल्म #Haider  की समीक्षा (यादों में इरफ़ान सीरीज...19)

कल रात (29/05/2020) यादों में इरफ़ान सीरीज के तहत् फ़िल्म #हैदर देखी जिसमें मुख्य किरदार हैदर की भूमिका निभाई है शाहिद कपूर ने। इस फ़िल्म में उनके अभिनय की खूब तारीफ हुई और इसके लिए शाहिद ने स्क्रीन अवॉर्ड, आईआईएफए अवॉर्ड, फिल्म फेयर के साथ साथ अन्य ढेरों अवॉर्ड्स भी बटोरे। शाहिद के साथ साथ के के मेनन और तबू को भी बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के लिए कई अवॉर्ड्स मिले। इस फ़िल्म ने कई नेशनल फ़िल्म अवॉर्ड भी जीते साथ ही बॉक्स ऑफिस पर भी खूब धूम मचाई।  विशाल भारद्वाज की इस फ़िल्म में इरफ़ान खान ने रूहदार के किरदार में स्पेशल अपीयरेंस दी है जो यकीनन रूह को छू जाती है। 2014 में गांधी जयंती के दिन रिलीज़ हुई फ़िल्म #हैदर शांति का पैग़ाम देती है। ये एहसास कराती है कि इंतकाम और बदले की भावना से सिर्फ नफ़रत और इंतकाम ही पैदा होता है, सच्चे अर्थों में हमें इस बदले की भावना से आज़ादी चाहिए। 
मकबूल और ओमकारा के बाद फ़िल्म हैदर विशाल भारद्वाज की सेक्सपियर की रचनाओं पर आधारित तीसरी फ़िल्म है। ये कहना अतिश्योक्ति ना होगी कि सेक्सपियर के नाटक हैमलेट का अडपटेशन विशाल भारद्वाज ने जिस ढंग से भारतीय परिप्रेक्ष्य में किया है और इसके ज़रिए जिस बारीकी से उन्होंने कश्मीर की समस्याओं को उठाया है वो काबिले तारीफ़ है। ये फ़िल्म ये साबित करती है कि भारद्वाज एक सजग और संवेदनशील निर्देशक हैं जिनका सामाजिक सरोकारों से भी गहरा नाता है क्यूंकि उनकी फिल्में दृष्टि निर्माण का भी कार्य करती हैं। 
फ़िल्म की कहानी कुछ यूं है कि डॉक्टर हिलाल मीर (नरेंद्र झा) एक मिलिटेंट का ऑपरेशन करने के लिए उसे अपने घर ले आते हैं क्यूंकि उस वक़्त वो इंसान उनके लिए एक मरीज़ की भूमिका में था जिसकी ज़िन्दगी बचाना उनका धर्म था। ये बात उनके और उनकी पत्नी गज़ाला (तब्बू) के संवाद से भी उस वक़्त स्पष्ट हो जाती है जब तब्बू उनसे पूछती है: डॉक्टर साहब आप किसकी तरफ हैं तो डॉक्टर हिलाल कहते हैं: ज़िन्दगी की तरफ। ये खबर किसी मुखबिर के ज़रिए फौज तक पहुंच जाती है और सज़ा के तौर पर पहले तो डॉक्टर साहब का घर बम से उड़ा दिया जाता है और फिर उन्हें भी गायब कर दिया जाता है। डॉक्टर साहब प्रतिनिधित्व करते हैं उन तमाम कश्मीरी लोगों का जो शक की बिनाह पर फौज के द्वारा नजरबंद किए गए और गायब कर दिए गए। वो डिटेंशन सेंटर में ज़िंदा हैं या मर गए इसका उनके घर वालों को कुछ भी पता नहीं चलता, उनके हाथों में अगर कुछ होता है तो वो है सिर्फ इंतज़ार। वो कश्मीरी औरतें जिनके पतियों को फौज के आदमी पकड़ कर ले जाते हैं,  जो डिटेंशन सेंटर में डाल दिए जाते हैं उन्हें कश्मीर में "हाफ विडो" यानि आधी बेवा कहा जाता है क्यूंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वो ज़िंदा अपने घर लौट पाएगा या नहीं। कश्मीर में आए दिन फौज का क्रैक डाउन होता है और हर समय वहां रह रहे लोगों से उनका पहचान पत्र दिखाने को कहा जाता है। आम कश्मीरी अपना पहचान पत्र इस कदर पुलिस वालों को दिखाने का आदी हो गया है कि कई बार ना पूछे जाने पर भी डर के मारे वो खट से अपना पहचान पत्र दिखाने लग जाता है। इस मुद्दे को फ़िल्म में निर्देशक ने संजीदगी से उठाया है। फ़िल्म में एक सीन बड़ा ही हृदय विदारक़ है जब एक कश्मीरी अपने घर के दरवाज़े पर घंटों खड़ा रहता है तो अर्शिया (श्रद्धा कपूर) जो पेशे से पत्रकार होती है वो रुहदार से पूछती है कि आखिर वो अपने घर के भीतर क्यूं नहीं जाता तो रुहदार उस इंसान के पास जाता है और उसका पहचान पत्र देखता है तब वो अपने घर के अंदर जाता है तो रुहदार अर्शिया से कहता है कश्मीरियों को ये नई तरह की मानसिक बीमारी हो गई है, उन्हें इतनी बार अपनी पहचान बतानी पड़ती है कि अपने घर के भीतर भी बिना पहचान पत्र दिखाए जाने की उनकी हिम्मत नहीं होती। लोगों से ज़्यादा फौज से भरे कश्मीर के बारे में फ़िल्म में एक जगह कहा भी जाता है कि : कश्मीर में ऊपर ख़ुदा है तो नीचे फौज। 
हैदर (शाहिद कपूर) जो अलीगढ़ में अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन कर रहा होता है उसे जब अपने पिता के गायब हो जाने की खबर मिलती है तो वो सब कुछ छोड़ कर कश्मीर आ जाता है। वो सीन बहुत ही भावुक करने वाला है जहां हैदर बदहवास सा लगभग राख में तब्दील हो चुके अपने घर में अपने अब्बू जी की निशानियां तलाशता है। उनके जूते, अपना बैट, अम्मी अब्बू की आधी जली तस्वीर उसे भीतर से तोड़ देती हैं। उस वक़्त हैदर और बुरी तरह से टूट जाता है जब वो अपनी अम्मी को अपने चचा खुर्रम (के के मेनन) के साथ नाचते गाते देखता है। अब्बू के गायब हो जाने और अम्मी के बेवफ़ा होने जाने का ग़म उसे भीतर ही भीतर सालता रहता है ऐसे में उसे रुहदार (इरफ़ान खान) अपने साथ ले जाता है और बताता है कि वो और उसके अब्बू एक ही डिटेंशन सेंटर में थे जहां उन्हें खूब प्रताड़ित किया गया और हाथ पैर बांधकर उन दोनों को मरने के लिए झेलम में फेंक दिया गया था। रुहदार तो जैसे तैसे रस्सी खुल जाने से बच जाता है पर हैदर के अब्बू की मौत हो जाती है। रुहदार हैदर से कहता है कि तुम्हारे अब्बू ने तुम्हारे लिए एक पैग़ाम दिया था, उन्होंने ने कहा था कि तुम अपने चाचा खुरम से उनकी मौत और तुम्हारी मां पर फरेब डालने का बदला लेना और अपनी मां को छोड़ देना, उसका हिसाब अल्लाह करेगा। 
फ़िल्म में एक डांस ड्रामा है "बिस्मिल बिस्मिल" जिसे शाहिद ने बहुत ही ज़बरदस्त तरीके से प्रस्तुत किया है, जिसे देख और सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस गाने के लिए सुखविंदर सिंह और इसे कोरिग्राफ करने के लिए इसके कोरियोग्राफर को नेशनल अवॉर्ड भी मिला है। 
आत्म ग्लानि के भाव को किरदारों के माध्यम से उकेरने में विशाल भारद्वाज सिद्ध हस्त हैं। जिस तरह से मकबूल में इरफ़ान खान और तब्बू को पंकज कपूर यानि अब्बा जी को मारने की ग्लानि होती है उसी तरह इस फ़िल्म में भी के के मेनन को अंत में अपने भाई को फरेब से मरवा देने की ग्लानि होती है और वो अपने भतीजे हैदर से मौत मांगता है पर वो भी उसे नसीब नहीं होती। 
ये फ़िल्म हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फ़िल्मों में से एक है जो ज़िन्दगी के कई सबक सिखला जाती है। वो प्रेम जिसकी इमारत फरेब की नींव पर रखी गई हो वो इमारत एक दिन खुद ब खुद धराशाई हो जाती है। एक गलती कई बार बहुत कुछ हमसे छीन लेती है। क्यूं कोई हैदर बंदूक उठाता है और कैसे कोई युवा मिलिटेंट बन जाता है इस बात को इस फ़िल्म में बड़े ही संजीदगी से दिखाया गया है। कश्मीर की सफेद चादर को खून के धब्बों से लाल ना करे कोई बस यही गुज़ारिश है मेरी।

Friday, May 29, 2020

फ़िल्म #मांझी द माउंटेन मैन की समीक्षा

फ़िल्म मांझी द माउंटेन मैन की समीक्षा 

#Sensiblecinema के तहत् आज (29/05/2020) नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी अभिनीत एवं केतन मेहता द्वारा निर्देशित #Manjhithemountainman देखी। 2015 में रिलीज हुई मांझी द माउंटेन मैन बिहार के गया के एक छोटे से गांव गेलूर के मजदूर दशरथ मांझी के जीवन पर आधारित फिल्म है जो बिना रुके, बिना थके लगातार 22 वर्षों तक एक पहाड़ को तोड़ते रहे ताकि उनके गांव और वजीरपुर की दूरी को कम किया जा सके और गांव वालों की ज़िन्दगी आसान बनाई जा सके। दशरथ मांझी ऐसे मिशन पर थे जिसे ना तो अंग्रेज़ पूरा कर सके और ना ही कोई सरकार उस पहाड़ को काटकर रास्ता बना पाई। इस फ़िल्म में दशरथ मांझी के किरदार के लिए #नवाज़ुद्दीन हमेशा याद किए जाएंगे। दशरथ मांझी (नवाज़ुद्दीन) की पत्नि का किरदार निभाया है राधिका आप्टे ने, उनके पिता मगरू के किरदार में हैं अशरफ उल हक़, मुखिया की भूमिका में हैं जाने माने फ़िल्म डायरेक्टर तिग्मांशु धूलिया और मुखिया के बेटे का किरदार निभाया है पंकज त्रिपाठी ने। ये कहानी है उस प्रबल प्रेम की जो अकेला ही अपनी छैनी और हथौड़े से पहाड़ को तोड़कर उम्मीदों का रास्ता आप ही बनाता है ताकि फिर कोई फगुनिया सही वक़्त पर इलाज के अभाव में दम ना तोड़े।

ये कहानी है उस दशरथ मांझी की जो अपने बाप मगरू की तरह गांव के मुखिया के यहां बेगारी नहीं करना चाहता इसलिए वो धनबाद भाग जाता है और वहां कोल माइन में काम करने लगता है पर जब उसे अपने गांव घर की याद आती है तो वो वापस आ जाता है। रास्ते में उसकी मुलाक़ात एक हंसमुख लड़की से होती है जो वही लड़की थी जिससे उसकी बचपन में शादी हुई थी पर अब लड़की का पिता अपनी बेटी को दशरथ के साथ भेजने से इंकार कर देता है। दशरथ फगुनिया को लेकर भाग जाता है। उनकी ज़िन्दगी संघर्ष भरी ज़रूर थी पर दोनों एक दूसरे के साथ ख़ुशी खुशी ज़िन्दगी बसर कर रहे थे। एक दिन फगुनिया दशरथ को रोटी पानी देने पहाड़ के रास्ते खेत पर जा रही थी कि पांव फिसल जाने से वह पहाड़ से गिर जाती है और अस्पताल पहुंचते पहुंचते दम तोड़ देती है। दशरथ फगुनिया से बेइंतहां मोहब्बत करता था, उसकी मौत की वजह वो पहाड़ थी जिससे वो गिरी थी। यहीं से दशरथ और उस पहाड़ के बीच जंग शुरू होती है। वो पहाड़ से कहता है: बहुत घमंड है ना तोहरा के, बहुत अकड़ है, सब भ्रम है, सारा अकड़ हम तोड़ेंगे, जब तक तोड़ेंगे नहीं छोड़ेंगे नहीं। वो रोज़ अपनी छैनी हथौड़ा लेकर पहाड़ तोड़ने जाता है। सब उसे पागल पहाड़ तोड़वा बुलाते हैं यहां तक कि उसके पिता भी कहते हैं काहे पहाड़ से अपना माथा टकरा रहा है, पहाड़ से कौन ख़ज़ाना निकलेगा तो दशरथ कहता है रास्ता निकलेगा। दशरथ का डायलॉग शानदार, ज़बरदस्त, ज़िंदाबाद प्रतीक है उसकी ज़िंदादिली और जुनून का जो कठिन से कठिन परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेकता, हार नहीं मानता और डटा रहता है अपने अटल विश्वास के साथ। जब पत्रकार उससे कहता है कि बड़ा मुश्किल है अपना अख़बार निकालना तो दशरथ उससे पूछता है क्या अपना अख़बार निकालना पहाड़ तोड़ने से भी कठिन है तो पत्रकार निशब्द हो जाता है। दशरथ प्रगतिशील विचारधारा का है जब उसे पता चलता है कि उसकी बेटी गांव एक ही एक लड़के से प्रेम करती है और दोनों शादी करना चाहते हैं तो वो लड़के के पिता को समझाने जाता है और जब वो नहीं मानता तो कहता है: तोड़ने को तो हम कुछ भी तोड़ सकते हैं, पहाड़ भी पर बच्चों का दिल मै नहीं तोड़ना चाहता। आखिरी सीन में दशरथ पत्रकार बाबू से कहता है: हमको हर चीज के लिए भगवान के भरोसे नहीं बैठना चाहिए, क्या पता भगवान हमारे भरोसे बैठा हो। अपना रास्ता आप ही बनाना है।
इस फ़िल्म के ज़रिए निर्देशक ने कई और गंभीर मुद्दों को भी सांकेतिक रूप में उठाया है फिर चाहे वो छुआछूत का मुद्दा हो, ऊंची जात वालों के द्वारा गरीब मजदूरों को बंधुआ बना उनसे बेगारी कराने का मामला हो, न्याय के अभाव में बंदूक उठा नक्सली बनने का मुद्दा हो, ऊंची जात वालों द्वारा कमज़ोर वर्ग के लोगों की औरतों का शोषण करने का मामला हो या फिर दबंगो द्वारा दशरथ मांझी के नाम पर मिलने वाली ग्रांट को हड़प कर जाने का मामला।
नवाज़ुद्दीन मुजफ्फरनगर से हैं इसलिए भाषा के साथ न्याय कर पाए। पंकज त्रिपाठी ने भी खलनायक की भूमिका को बख़ूबी निभाया है। फगुनिया के किरदार को राधिका ने भी अच्छे से निभाने की कोशिश की है। डायरेक्टर ने नवाज़ुद्दीन को दशरथ मांझी जैसा लुक देने की भरपूर कोशिश की और कामयाब रहे। नवाज़ुद्दीन ने जिस आत्मीयता से इस किरदार को निभाया है वो कभी भूला नहीं जा सकता। इस फ़िल्म को हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों की श्रेणी में रखा जा सकता है। घोर निराशा में फगुनिया की स्मृति दशरथ के थके हारे मन में ऊर्जा का संचार करती है। पहाड़ को चीरकर बनाया गया रास्ता दशरथ मांझी और फगुनिया के प्रेम की अमिट निशानी के रूप में हमारी स्मृतियों में रहेगा जो किसी ताजमहल से कम नहीं।

Thursday, May 28, 2020

फ़िल्म #ब्लैकमेल की समीक्षा

फ़िल्म #ब्लैकमेल की समीक्षा (यादों में इरफ़ान सीरीज...18) 

आज (28/05/2020) यादों में इरफ़ान सीरीज के तहत इरफ़ान अभिनीत एवं अभिनय देव द्वारा निर्देशित फ़िल्म #Blackmail देखी जो 2018 में रिलीज़ हुई थी। ये फ़िल्म पति पत्नि के दाम्पत्य जीवन में किसी तीसरे के आने से आ जाने वाली अनचाही मुसीबतों की कहानी है जिसमें एक झूठ को छुपाने के लिए अनगिनत झूठ के बाण चलाने के कारण पति पत्नि और वो (यहां वो महिला नहीं पुरुष है) तीनों मुश्किलों के भंवर जाल में फस जाते हैं। ये फ़िल्म हंसाते हंसाते कई सबक सिखा जाती है। फ़िल्म में इरफ़ान के अलावा हैं कीर्ति कुल्हारी, अरुणोदय सिंह, दिव्या दत्ता एवं ओमी वैद्य। 
ये फ़िल्म एक टॉयलेट पेपर बेचने वाली कंपनी में काम करने वाले देव (#इरफ़ानखान) की कहानी है जो देर रात तक ऑफिस में ही वीडियो गेम खेलता रहता है और सबसे आख़िरी में घर जाता है जबकि वो शादीशुदा है। कहने को तो देव की एक ख़ूबसूरत पत्नि है पर वो या तो टीवी देखने में बिज़ी रहती है या देव के आने से पहले ही सो जाती है। जब ऑफिस का गार्ड उससे पूछता है कि वो इतनी देर तक ऑफिस में क्यूं रहता है, उसकी तो शादी हो चुकी है तो देव एक लम्बी सांस छोड़ते हुए कहता है कि शादी तो गावों में होती है शहरों में तो बैंड बजता है। एक दिन अपने दोस्त के कहने पर वो गुलाब लिए घर जल्दी पहुंच जाता है रीना (#कीर्तिकुल्हारी) को सरप्राइज देने के इरादे से पर घर पहुंचकर रीना की बाहों में किसी और को देखकर ख़ुद सरप्राइज्ड हो जाता है। एक बार तो उसके मन में आता है कि वो उस इंसान का ख़ून कर दे पर आहत देव चुपचाप घर से बाहर आ जाता है। देव दोनों को सबक सिखाने के इरादे से रंजीत अरोड़ा (#अरुणोदयसिंह) को ब्लैकमेल करता है कि अगर उसने उसे एक लाख रुपए नहीं दिए तो वो रीना के पति को सब बता देगा। रंजीत अपनी पत्नि डॉली वर्मा (#दिव्यादत्ता ) से इंपोर्ट एक्सपोर्ट के बिज़नेस के नाम पर पैसे मांगता है। देव उससे अपने घर की ईएमआई, टीवी का रिचार्ज और बाकी के खर्चे का हिसाब चुकता करने की सोचता है। वो ये बात अपने दोस्त से साझा करता है, वो दोस्त उनके ही ऑफिस में काम करने वाली प्रभा से शेयर करता है और प्रभा देव को ब्लैकमेल करने लगती है। देव प्रभा को पैसे देने के लिए फिर रंजीत को ब्लैकमेल करता है अब रंजीत एनोनिमस मेल आईडी से देव की पत्नि रीना को ब्लैकमेल करता है। इस तरह वही पैसा ब्लैकमेल ब्लैकमेल खेल में इधर से उधर घूमता रहता है। इरफ़ान का कॉमिक सेंस बहुत ज़बरदस्त है। बॉक्सर पहनकर सर पर एक रिसाइकल्ड कैरी बैग में आंखों के पास छेद करके इरफ़ान प्रभा के मरने पर उसके घर से जिस तरह भागता है और लोग उसके पीछे पड़ते हैं वो सीन फुल कॉमेडी सीन है पर त्रासदीपूर्ण भी क्यूंकि अपनी पत्नि और उसके बॉयफ्रेंड को सबक सिखाने का जो तरीक़ा देव ने अख़्तियार किया था वो नित नए जोखिमों से भरा था। देव को लगा था कि वो रीना के बॉयफ्रेंड को ब्लैकमेल करके दोनों को सबक भी सिखा देगा और उस पैसे से उसका कर्ज़ा भी उतर जाएगा। पर जैसा सोचो सब कुछ वैसा कहां होता है। फ़िल्म सिचुएशनल कॉमेडी के ज़रिए कई दिल को कचोटने वाले एहसास करा जाती है। 
दिव्या दत्ता का रोल थोड़ा ही है पर उनका अभिनय लाजवाब है, अरुणोदय के अभिनय को निखरते हुए देखना एक अच्छा अनुभव रहा, ओमी वैद्य को देखकर आपको थ्री इडियट्स में उनके अभिनय की याद आ जाएगी। इरफ़ान तो अपने अभिनय से सबको चकित और मौन कर देते हैं। फ़िल्म का टाइटल ट्रैक स्टोरी को सपोर्ट करता है। अच्छी फ़िल्म है, देख सकते हैं।

Tuesday, May 26, 2020

फ़िल्म #Pataallok की समीक्षा

वेब सीरीज #Pataallok की समीक्षा 

इन दिनों वेब सीरीज #पाताललोक की खूब चर्चा है। कल रात (25/0502020) मैंने भी ये वेब सीरीज देखी। नीरज कुन्देर सीधी भइया ने भी कहा था ये फ़िल्म देखनी चाहिए। #Jaavedakhtar साहब ने भी ट्विटर पर इस सीरीज की तारीफ़ की है। इसके अलावा आलिया भट्ट, अर्जुन कपूर और रणबीर सिंह ने भी अनुष्का शर्मा को इस सीरीज के प्रोडक्शन के लिए बधाई दी और पाताल लोक की तारीफ की। इस फ़िल्म की सफलता ऐक्टर अनुष्का शर्मा के लिए इसलिए भी मायने रखती है क्यूंकि बतौर प्रोड्यूसर ये उनका पहला वेब प्रोडक्शन है। पाताल लोक अमेजॉन प्राइम वीडियो पर 15 मई, 2020 से स्ट्रीम हो रही है। नौ एपिसोड की इस थ्रिलर ड्रामा वेब सीरीज में मुख्य किरदार की भूमिका में हैं जयदीप अहलावत, नीरज काबी एवं गुल पनाग। इस वेब सीरीज का कॉन्सेप्ट तीन लोकों (स्वर्ग, धरती और नर्क या पाताल लोक) पर आधारित है। हाथी राम चौधरी (जयदीप अहलावत) फ़िल्म में एक जगह अपने जूनियर पुलिस वाले से कहता है, दिल्ली के थानों को एरिया वाइज स्वर्ग, धरती और पाताल लोक में बांटा जा सकता है। स्वर्ग लोक में आते है पॉश और वीआईपी दिल्ली के इलाके वाले थाने, धरती लोक में शाहदरा, महरौली के इलाके वाले थाने और जमुना पार वाले थाने हुए पाताल लोक के थाने जहां रहते हैं कीड़े मकौड़े। रियलिज्म के नक्शे कदम पर आधारित इस वेब सीरीज का हीरो (जयदीप अहलावत)हमें अपना सा लगता है, बड़ा ही नेचुरल बिना किसी सुपर पॉवर के जो धूर्त और फरेबी लोगों तथा अपराधियों के मुंह ना खोलने पर ताबड़तोड़ गालियां भी देता है। फ़िल्म का विलेन जिसे सब हथौड़ा त्यागी (अभिषेक बैनर्जी) के नाम से पहचानते हैं जब हमें उसकी असली कहानी का पता चलता है तो दिल नहीं करता कि उससे नफ़रत की जाए। हथौड़ा त्यागी यानि विशाल एक अच्छा स्पोर्ट्स मैन बन सकता था पर हालात ने उसे अपराधी बना दिया। इस सीरीज में अभिषेक बैनर्जी ने अपने अभिनय से सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। फ़िल्म में अभिषेक के गिने चुने डायलॉग हैं फिर भी वो अपने हावभाव से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खीचने में सफल हुए हैं। फ़िल्म में फ़्लैश बैक तकनीक का बेहतर उपयोग किया गया है। हालाकि कहानी आधे में समझ में आ जाती है लेकिन फ़्लैश बैक तकनीक के ज़रिए जिस तरह से पुलिस की गिरफ्त में आए चारो लोगों की कहानी बताई गई है वो दिलचस्प है।
फ़िल्म की कहानी कुछ यूं है कि चार लोग एक जाने माने न्यूज एंकर संजीव मेहरा (नीरज काबी) को मारना चाहते हैं पर अपने मिशन में कामयाब नही हो पाते और पुलिस की गिरफ्त में आ जाते हैं। पुलिस के पास से ये केस सीबीआई के पास चला जाता है और सीबीआई इस केस को एक नया रंग दे देती है। सीबीआई कहती है कि कोई अंतरराष्ट्रीय गैंग संजीव मेहरा को मारना चाहता है ताकि देश में अस्थिरता का माहौल बने। पर इस केस की सच्चाई कुछ और थी और कई लीड्स के ज़रिए हाथी राम उस सच्चाई तक पहुंचने वाला ही होता है कि उसे सस्पेंड कर दिया जाता है। सस्पेंड होने के बावजूद हाथी राम चौधरी हार नहीं मानता और केस को अपने स्तर पर सुलझाने की कोशिश करता है जिसमें उसका जूनियर इमरान उसकी काफी मदद करता है। वो केस की तह तक पहुंच जाता है और उसकी एवज में मुंह बंद रखने के लिए उसका सस्पेंशन ख़त्म कर दिया जाता है। फ़िल्म में कई किरदारों की कहानियां एक साथ चल रही होती हैं। चीनी के बचपन की कहानी जब उसका दोस्त हाथी राम को बताता है तो उन दृश्यों को देखकर मीरा नैयर की फ़िल्म सलाम बॉम्बे के स्ट्रीट चिल्ड्रेन की संघर्ष भरी ज़िन्दगी की याद आ जाती है और मन सिहर उठता है। हथौड़ा उर्फ विशाल त्यागी की कहानी बुंदेलखंड ले जाती है। अपनी बहनों का बदला लेने के लिए विशाल स्कूल में तीन लड़कों की हथौड़ा मारकर हत्या कर देता है। बुंदेलखंड का दुनलिया गूजर विशाल को पुलिस से बचाकर उसे अपने यहां पनाह देता है जिसका कर्ज़ वो मरते दम तक चुकाता है और उसके लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहता है। सारे मर्डर विशाल ने दुनलिया उर्फ़ मास्टर जी के कहने पर किए थे पर न्यूज़ एंकर संजीव मेहरा को मारते वक़्त उसके हाथ क्यूं ठिठक जाते हैं जानने के लिए इस वेब सीरीज को देखिएगा। बुन्देली भाषा कहीं कहीं अवधी के साथ मिलकर खिचड़ी हो गई है जो सिर्फ बुन्देली क्षेत्र से वास्ता रखने वालों को ज़रूर  महसूस होगी। नीरज काबी का रोल भी काबिले तारीफ है। चोर चोर मौसेरे भाई की कहावत को चरितार्थ करती यह फ़िल्म सत्ता और अपराधियों के गठजोड़ को बख़ूबी दिखाती है। कुछ डायलॉग्स बहुत उम्दा हैं जैसे : जिसे मैंने मुसलमान तक ना बनने दिया उसे आप लोगों बने जिहादी बना दिया, हमरी आंख में नागिन को मेमोरी है रे जो फोटो देख लेते हैं दिमाग में कैद हो जाता है, शास्त्रों में लिखा है पर मैने व्हाट्सएप पर पढ़ा था आदि। इस सीरीज को आप अपनी व्यू लिस्ट में शामिल कर सकते हैं।

Saturday, May 23, 2020

फ़िल्म #Amightyheart की समीक्षा

फ़िल्म ए माइटी हार्ट की समीक्षा (यादों में इरफ़ान सीरीज ...17) 

इरफ़ान खान की अभिनय यात्रा को करीब से समझने के लिए और उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए मैंने आज (23/05/2020) यादों में इरफ़ान सीरीज के तहत उनकी फ़िल्म #Amightyheart  देखी। इस फिल्म में उनका किरदार पाकिस्तान के सीआईडी चीफ जावेद हबीब का है। फ़िल्म में मुख्य किरदार की भूमिका में हैं एंजेलिना जॉली। फ़िल्म का निर्देशन किया है माइकल विंटरबॉटम ने, जिसे 2007 में रिलीज किया गया था। ये फ़िल्म 2002 में पाकिस्तान में एक अमरीकी पत्रकार डेनियल पर्ल के बड़े ही नाटकीय ढंग से हुए अपहरण और बाद में उसकी बेरहमी से की गई हत्या पर आधारित है पर डेनियल से ज़्यादा ये फ़िल्म उसकी पत्नि मैरियन पर्ल के हौसले और धैर्य की कहानी है जो अंत तक अपने पति को वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास करती है, नाज़ुक पलों में भी ख़ुद को बिखरने नहीं देती। ये जानने के बावजूद कि जिहादियों ने उसके पति और उसके होने वाले बच्चे के पिता की नृशंस हत्या की है वो उनसे नफ़रत नहीं करती बल्कि भविष्य में उनसे नफ़रत की राह छोड़कर प्रेम और सौहार्द्र की उम्मीद लेकर पाकिस्तान से अपने मुल्क रवाना होती है। सत्य घटना पर आधारित इस फिल्म के साथ निर्देशक और अभिनेताओं ने काफी हद तक इंसाफ किया है। एंजेलिना जॉली ने डेनियल पर्ल की पत्नि मरियन पर्ल के किरदार को बखूबी आत्मसात किया है और इसके लिए उन्हें खूब सराहा गय साथ ही इस रोल के लिए उन्हें कई अवॉर्ड्स भी मिले। 
डेनियल पर्ल और उनकी पत्नी मैरियन पेशे से पत्रकार होते हैं और न्यूज़ स्टोरी के लिए पाकिस्तान आते हैं। डेनियल एक खोजी पत्रकार होता है और उसे एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू के लिए किसी से मिलने जाना होता है। वो शाम तक वापस लौट आने का अपनी पत्नि से वादा कर उस इंटरव्यू के लिए निकल पड़ता है और उस इंटरव्यू के बाद उन्हें अमेरिका वापस जाना था। मैरियन छः महीने की गर्भवती होती है। ये सोचकर की डेनियल शाम तक वापस आ जाएगा वो उसके लिए क्यूबन डिश बनाती है पर डेनियल का फोन लगातार स्विच्ड ऑफ आता है। मैरियन को कुछ गड़बड़ होने की आशंका होती है तो वो तुरंत डेनियल का मेल अाई डी चेक करती है और उसकी शंका यकीन में बदल जाती है। मैरियन की मदद के लिए पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसी के साथ साथ न्याय विभाग और अमेरिका का डिप्लोमेटिक सिक्योरिटी सर्विस आगे आता है, सभी अपनी ओर से डेनियल को बचाने की हर संभव कोशिश करते हैं खासकर पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसी के कैप्टन ज़ीशन काज़मी (इरफ़ान खान) ने बहुत मदद की पर वो डेनियल को जिहादियों के कोप से बचा ना सके। एक वीडियो संदेश के ज़रिए वो डेनियल का सर क़लम करते हुए दिखाते हैं।   ये फ़िल्म डेनियल के अचानक से गायब हो जाने के बाद, उसके अपहरण को सियासी रंग देने और डेनियल के तालुक अमेरिका की खुफिया एजेंसी से जोड़ने की अफवाहों, उसे छोड़ने की एवज में ओमर शेख और उसकी टीम द्वारा अमेरिका द्वारा कैद किए गए उनके साथियों को रिहा कराने की मांग से लेकर नौ दिन तक दिन रात डेनियल को ढूंढने और वापस ज़िंदा लाने की उम्मीद में धीरज रखने वाली मैरियन के अदम्य साहस की कहानी है। 
इस फ़िल्म में एंजेलिना जॉली की सुरक्षा के मद्देनजर ज़्यादातर शूटिंग उत्तर भारत में की गई है पर फ़िल्म में एंजेलिना के कोस्टार फुटरमं ने बैकग्राउंड लोकेशन का रियल फील लाने के लिए ज़्यादातर शूट पाकिस्तान के उस रियल लोकेशन पर जाकर की जहां से पत्रकार डेनियल गायब हुए थे। फ़िल्म यकीनन काबिले तारीफ़ है, वक़्त मिले तो देखिएगा।

Thursday, May 21, 2020

फ़िल्म #Kuselan की समीक्षा जिसका रीमेक थी #Billu

फ़िल्म #Kuselan का हिंदी डब वर्ज़न दिलवाला द रियल मैन की समीक्षा 

मिशन #Sensiblecinema और यादों में इरफ़ान सीरीज के तहत आज (21/05/2020) रजनीकांत, पशुपति, मीना और नयनतारा अभिनीत तमिल फिल्म #Kuselan जो 2008  में रिलीज़ हुई थी उसका हिंदी डब वर्ज़न #Dilwalatherealman देखा। इस फ़िल्म को निर्देशित किया है पी वासु ने और ये फ़िल्म 2007 में अाई मलयालम फ़िल्म कथा परायुंबोल का रीमेक थी। आप सोच रहे होंगे मैंने कहा यादों में इरफ़ान सीरीज के तहत ये फ़िल्म देखी पर इस फिल्म में तो इरफ़ान हैं ही नहीं। दरअसल उनकी फिल्म #Billu इन फिल्मों का रीमेक है, मुझे बिल्लू तो नहीं मिली तो सोचा क्यूं ना तमिल मूवी #Kuselan ही देख ली जाए। कुसेलन महाभारत के वो पात्र थे जो श्री कृष्ण के बचपन के सखा माने जाते हैं और जिन्हें उत्तर भारत में शायद हम सुदामा के नाम से जानते हैं जो श्री कृष्ण से अपनी दरिद्रता और गरीबी के कारण मिलने से हिचकिचाते हैं कि कहीं कृष्ण उन्हें अपना सखा मानने से ही इंकार ना कर दे। इसी कहानी को कूसेलन फ़िल्म का आधार बनाया गया है जो दो ऐसे दोस्तों की कहानी है जो बचपन में साथ पढ़े थे। हालत ने उसमें से एक को बाल काटने वाला नाई बना दिया तो दूसरे को क़िस्मत ने फ़िल्मों का सुपर स्टार। 
बालकृष्ण यानि बालू (पशुपति) और अशोक कुमार (रजनीकांत) बचपन में एक ही स्कूल में पढ़े थे। बालकृष्ण ने ही अशोक को इस बात का एहसास कराया था कि उसके अंदर एक कलाकार है और उसे फ़िल्मों में ट्राई करना चाहिए। अशोक को मद्रास भेजने के लिए बालकृष्ण अपने कान की बाली बेंचकर उसके लिए पैसों का बंदोबस्त करता है। ये बात सभी को तब पता चलती है जब स्वयं सुपर स्टार बन चुके अशोक कुमार एक स्कूल की सिल्वर जुबली में अपने दोस्त बालू के बारे में सबको बताते हैं, अपना बचपन और अपने बचपन के दोस्त के बारे में बताते हुए उनकी आंखें भर आती हैं। बालू भी अपने दोस्त अशोक कुमार की बातें सुनकर सिसक सिसक कर रो पड़ता है, उसकी पत्नि देवी (मीना) की आंखें भी भर आती हैं। फ़िल्म के आखरी के पंद्रह मिनट की कहानी आंखें नम कर जाती है और अशोक और बालू के साथ साथ हमें भी रोने पर मजबूर कर देती है। बालकृष्ण पेशे से एक नाई होता है और अपने पिता की बाल काटने की दुकान में पड़ी टूटी कुर्सी, जंग लगी कैंची को बदलकर दुकान को नया रंग रूप देना चाहता है पर उसके लिए उसके पास उतने रुपए नहीं होते। उसे लोन भी नहीं मिलता क्यूंकि वो उसूलों का पक्का है और रिश्वत देने के ख़िलाफ़। ग़रीबी के चलते वो अपने बच्चों की फीस तक समय पर नहीं भर पाता जिसकी वजह से बच्चों को स्कूल में शर्मिंदा होना पड़ता है और बालू को इस वजह से अपने बच्चों की नाराज़गी का शिकार होना पड़ता है। एक दिन उसे पता चलता है कि उसके गांव में सुपर स्टार अशोक कुमार अपनी किसी फ़िल्म की शूटिंग के लिए आ रहे हैं तो उसके मुंह से धोखे से निकल जाता है कि अशोक कुमार बचपन में उसके साथ ही पढ़े थे। ये बात पूरे गांव में जंगल की आग की तरह फ़ैल जाती है, लोग उससे अशोक कुमार से मिलवाने की उम्मीद लगाने लगते हैं और जब वो नहीं मिला पाता तो हंसी और मज़ाक का पात्र बनता है। एक बड़े आदमी से बचपन की दोस्ती उसके जी का जंजाल बन जाती है। उसके बच्चों को भी लोग ताने मारते हैं। पशुपति ने बालू के किरदार को बड़े ही प्रभावी ढंग से निभाया है। उनके हाव भाव, संवाद, आंखों से छलकती बेबसी दिल को भेद देती है। हंसाते हंसाते फ़िल्म आखिर में रुला जाती है। रजनीकांत और नयनतारा का कैमियो रोल है। आखरी के पंद्रह मिनट में रजनीकांत अपने संवाद और अभिनय से रुला देते हैं। लाजवाब फ़िल्म है, देखिएगा ज़रूर।