Showing posts with label # SalaamBombay #Miranair #Irrfankhan #Raghuviryadav. Show all posts
Showing posts with label # SalaamBombay #Miranair #Irrfankhan #Raghuviryadav. Show all posts

Tuesday, May 5, 2020

फ़िल्म #SalaamBombay की समीक्षा (यादों में इरफ़ान...06)

फ़िल्म #SalaamBombay की समीक्षा (यादों में इरफ़ान सीरीज...06)

 आज (05/05/2020) यादों में इरफ़ान सीरीज के तहत  मीरा नायर निर्देशित, 1988 में रिलीज़ हुई फ़िल्म #SalaamBombay फ़िल्म देखी। इस फिल्म से ही इरफ़ान खान को बॉलीवुड में ब्रेक मिला, उस वक़्त इरफ़ान एनएसडी (राष्ट्रीय नाट्यविद्यालय) के छात्र थे। हालाकि इस फ़िल्म में उनका रोल बहुत ही छोटा है, वो एक चिट्ठी लिखने वाले होते हैं और आप उन्हें उस वक़्त नोटिस कर सकते हैं जब चाय पाव यानि कृष्णा (शफीक सैय्यद) इरफ़ान से अपनी मां के लिए चिट्ठी लिखवाने आता है। मीरा नायर की ये फ़िल्म बॉम्बे के फुटपाथ और तंग गलियों में ज़िन्दगी बसर करने वाले गली के बच्चों पर आधारित है। ये कहानी उन ख्वाबों के टूटने की कहानी है जो कृष्णा, चिलम, मंजू, मंजू की मां और सोलह साल सभी की आंखों में पलते हैं। एक बेहतर ज़िन्दगी जीने की आस में तिल तिल रोज़ मरते ख़्वाब की कहानी सलाम बॉम्बे। 

कहानी के केंद्र में है ग्यारह बारह साल का कृष्णा जो इस उम्मीद में बॉम्बे आ गया कि जिस दिन उसके पास पांच सौ रुपए इकट्ठे हो जाएंगे वो अपने मुल्क अपनी मां के पास लौट जाएगा क्यूंकि उसने गुस्से में अपने भाई की मोटरबाइक तोड़ दी थी तो मां ने कहा था अब घर वापस तब ही आना जब 500 रुपए हो मोटरबाइक सुधरवाने के लिए और वो पांच सौ रुपए वो लाख मेहनत करने के बाद भी नहीं जोड़ पाता। वो पांच सौ रुपए कमाने के लिए एक सर्कस में काम करता है, सर्कस के मास्टर के लिए पान मसाला लेने जाता है और वापस आकर देखता है तो सर्कस कंपनी वहां नहीं होती, कृष्णा जैसे तैसे बॉम्बे पहुंचता है, वहां एक चाय पाव की दुकान में काम करने लगता है और सभी उसे चाय पाव कहकर बुलाने लगते हैं, कोई उसे कृष्णा कहकर नहीं बुलाता, ये शहर उससे उसकी पहचान ही छीन लेता है, बड़ी मुश्किल से अपनी उम्र से दुगुनी उम्र का एक दोस्त चिलम (रघुवीर यादव)) मिलता है पर ऊपर वाला वह दोस्त भी उससे छीन लेता है। कृष्णा अपने मुल्क जाने की उम्मीद लिए चाय पाव की दुकान से नौकरी छूट जाने के बाद कई तरह के काम करता है: बूचड़ खाने की दुकान पर, शादी पार्टियों में वेटर का काम, छोटी मोटी लूट खसोट भी पर बॉम्बे की गलियों में रहने वाले दूसरे बच्चों की तरह वो नहीं हो पाया था, उसमें संवेदना और दूसरों के लिए दया अब भी बाकी थी तब ही वो चिलम को पैसे देने से मना नहीं कर पाता, सोलह साल के लिए मंजू के हाथों बिस्कुट का पैकेट भेजता है, चिलम जब बहुत थक हार जाता है तो चाय पाव मालिक से एक चाय चिलम के लिए भी मांगता है। जिस रेड लाइट एरिया में कृष्णा चाय देने जाता था वहां एक लगभग सोलह साल की नई लड़की को लाया गया था, वो रोती बिलखती रहती है और वैश्यावृत्ति के लिए तैयार नहीं होती। कृष्णा को उस पर दया आती है और धीरे धीरे वो उस सोलह साल की तरफ आकर्षित होने लगता है पर उस सोलह साल को बाबा (नाना पाटेकर) अपने प्रेम जाल में फांस लेता है और उसे उस कोठे से निकाल बेहतर ज़िन्दगी देने का वादा करता है। वो भोली लड़की ये नहीं जानती की उसे काबू में लाने के लिए कोठेवाली बाई ने बाबा को उसे प्रेम से हैंडल करने के लिए बोला था और उसके लिए बाबा को एक हज़ार रुपए मिलने थे। कृष्णा की निगाहें सोलह साल को सज संवारकर किसी की कार में बैठे कहीं जाते हुए तक रहीं थीं और सोलह साल की आंखें उम्मीद भरी निगाहों से बाबा की ओर देख रहीं थीं पर कोई कुछ नहीं कर पाता और इस तरह एक और ज़िन्दगी झोंक दी जाती है वासना के गर्त में। दूसरी तरफ एक और कहानी है मंजू और मंजू की मां की। मंजू की मां को बाबा ये कहकर कोठे से उठाकर अपने घर लाया था कि अब उसे नर्क की ज़िन्दगी नहीं जीनी पड़ेगी, वो उससे शादी करेगा पर वो कोठे से तो निकल आती है पर मजबूरन कोठा उससे नहीं निकल पाता उसे यहां भी वही करना पड़ता है पैसों के लिए। वेदना से भरी हर कहानी को देखकर बरबस आह निकल पड़ी है। लाजवाब। नहीं देखी तो ज़रूर देखिएगा।