Friday, May 1, 2020

फ़िल्म #Maqbool की समीक्षा (यादों में इरफ़ान सीरीज...03)

फ़िल्म #Maqbool की समीक्षा (यादों में इरफ़ान सीरीज...03) 
आज (01/05/2020) मिशन #Sensiblecinema और यादों में इरफ़ान सीरीज के तहत फ़िल्म #मकबूल दोबारा देखी। विशाल भाद्वाज द्वारा निर्देशित, 2003 में रिलीज़ हुई मकबूल "मैकबेथ" का ऐडपटेशन है। फ़िल्म में पंकज कपूर, इरफ़ान खान, ओम पुरी, नसरुद्दीन शाह और तब्बू जैसे दिग्गज कलाकारों ने काम किया है। वैसे तो अंडरवर्ल्ड पर भारतीय सिनेमा में कई फ़िल्में बनी हैं पर मकबूल की बात ही अलग है। शुरू के 10 मिनट तक फ़िल्म समझ में नहीं आती फिर धीरे धीरे एक एक लेयर खुलती जाती है और फ़िल्म की कहानी समझ में आने लगती है और कौतूहल बढ़ता जाता है। फ़िल्म की पटकथा, संवाद, अभिनय और संगीत सब कुछ लाजवाब है। ये फ़िल्म कहानी है अंडरवर्ल्ड के मकबूल (इरफ़ान खान) और उसकी प्रेयसी निम्मा (तब्बू) के अपराधबोध की। कहावत भी है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय। हम जो बोते हैं वही काटते हैं। स्वार्थ या किसी मोह के वशीभूत होकर जब हम कोई ग़लत राह पर चल पड़ते हैं तो हमारा ज़मीर बार बार हमें ऐसा ना करने के लिए रोकता टोकता है, हमें सदा देता है पर हम उसे नजरअंदाज कर आगे निकल जाते हैं। पर वक़्त की मार बड़ी ज़ालिम होती है हुज़ूर, कोई रियायत नहीं मिलती, अपने किए का अपराधबोध हर वक़्त हमें सालता रहता है, साए की तरह हमारा पीछा करता रहता है, हमसे जोंक की तरह चिपक जाता है और ऐसा ही होता है मियां मकबूल और निम्मा के साथ भी। 
जहांगीर उर्फ बब्बा जी (पंकज कपूर) जो मुंबई के डॉन के नाम से जाना जाता वो किसी ज़माने में लालजी नाम के डॉन का दाहिना हाथ माना जाता था। लालजी के मारे जाने के बाद जहांगीर उनकी गद्दी पर बैठता है और अंडरवर्ल्ड के सारे काम यहां तक की नेताओं पर कमांड भी वही रखता है। मकबूल (इरफ़ान खान) बचपन से ही बब्बा जी के साथ रहा है उनका वफादार और चहेता होता है। बब्बा जी उम्र दराज होने के बावजूद आशिक़ मिज़ाज के होते हैं, उनकी बेटी की उम्र की लड़की (तब्बू) से निकाह किया और उसके इश्क़ की गिरफ्त में होते हैं पर तब्बू का दिल मकबूल पर आ जाता है और धीरे धीरे वो भी तब्बू को पसंद करने लगता है पर ये डर हर वक़्त उसे सताता है कि अगर बब्बा जी को उन दोनों के बारे में पता चल गया तो क्या होगा पर बेखौफ तब्बू बस किसी भी हाल में मकबूल की हो जाना चाहती है। वो मकबूल को उकसाती है कि वो बब्बा जी को मार दे या फिर उसे मार डाले और तब्बू के इश्क़ के वशीभूत हो मकबूल बब्बा जी को मार देता है और उनकी जगह ले लेता है। यहीं से मकबूल का पतन होना शुरू होता है, वो अपराधबोध की अग्नि में जलता रहता है, हर वक़्त डरा सहम, हर किसी को शक की निगाह से देखता है। यहां तक कि निम्मा के पेट में पलने वाले अपने बच्चे को भी बब्बा जी का बच्चा समझता है। इधर निम्मा को भी लगता है बब्बा जी के खून के धब्बे दीवार पर और छींटे उसके चेहरे पर अब तक हैं, वो अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है। मकबूल के सौ दुश्मन तैयार हो जाते हैं। फ़िल्म में मकबूल का किरदार खलनायक का है पर फिर भी मकबूल से नफ़रत नहीं होती, लगता है वो उसके सर पर मंडरा रहे मौत के साए से बस किसी तरह बाहर आ जाए। 
बब्बा जी के किरदार को पंकज कपूर ने ज़बरदस्त तरीके से निभाया है, उनके संवाद, उनकी आंखें और भाव भंगिमा लाजवाब हैं। इस फ़िल्म में उनके अभिनय की खूब सराहना हुई है। तब्बू और इरफ़ान की लुका छिपी वाली मोहब्बत देखते ही बनती है। पुलिस वाले पंडित जी (ओम पुरी) की भविष्यवाणी भी कौतूहल पैदा करती है कि भला अब आगे क्या होने वाला है। इरफ़ान का अभिनय दिल को छूता है। अंत में उनकी आखों से झलकता दर्द देखकर ऐसा लगता है मानो वो ऊपर वाले से अपने गुनाहों की माफी मांग रहा हो। जटिल से जटिल किरदार को बड़ी ही सहजता से निभा लेने गज़ब का हुनर था इरफ़ान में।

Thursday, April 30, 2020

फ़िल्म #Angrezimedium की समीक्षा (यादों में इरफ़ान सीरीज...02)

फ़िल्म #Angrezimedium की समीक्षा (यादों में इरफ़ान सीरीज...02)

 मिशन #Sensiblecinema के तहत इरफ़ान खान को भाव भीनी श्रद्धांजलि स्वरूप मैंने यादों में इरफ़ान सीरीज शुरू की है, उनकी जितनी फिल्में मुझे देखने को मिलेंगी मैं यहां उनकी समीक्षा करने का प्रयास करूंगी। तो यादों में इरफ़ान सीरीज के तहत आज (30/04/2020) मैंने #Angrezimedium देखी। बहुत ही उम्दा फ़िल्म है, बहुत कुछ सिखाती है हमें। जहां एक ओर इस फ़िल्म में बाप बेटी का प्यार दुलार, उनके बीच की मीठी नोक झोंक, बीच में होने वाली गलतफहमियां, एक पिता की अपनी बेटी के लिए बेपनाह मोहब्बत और परवाह वाले सीन्स और संवाद हमें भावुक करते हैं तो दूसरी ओर चंपक (इरफ़ान खान) और उसके चचेरे भाई गोपी  के बीच असीम स्नेह आखिर में आंखों को नम कर जाता है, लंदन जैसे शहर में काम की व्यस्तता और अपनी प्राइवेसी को बरकरार रखने के कारण रिश्तों की गर्माहट को भूल चुकी एक बेटी (करीना कपूर) को अपनी मां (डिंपल कपाड़िया) के क़रीब फिर से लाने के लिए इरफ़ान उर्फ चंपक का करीना को समझना, उनकी सहज सरल मगर प्रभावशाली संवाद अदायगी मन को छू जाती है।
फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह है कि उदयपुर का मिठाई बेचने वाला चंपक (इरफ़ान खान) अपनी बेटी तारिका (राधिका मदन) को विदेश में पढ़ाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। वो अपनी बेटी के विदेश में पढ़ने के उसके सपने को हर हाल में पूरा करना चाहता है वो नहीं चाहता कि उसकी बेटी के ख़्वाब उसकी पत्नि के ख्वाबों की तरह टूट जाएं। उसकी पत्नी आगे पढ़ना चाहती थी पर उसकी लापरवाही की वजह से वो आगे बढ़ ना सकी, तारिका को जन्म देते ही वो चल बसी। चंपक ने ही तारिका को मां और बाप बनकर पाला। तारिका एक एवरेज स्टूडेंट होती है पर ट्रूफॉर्ड यूनिवर्सिटी जाने की ललक में खूब मेहनत करती है और 55 से 85 प्रतिशत लाती है पर चंपक के उसके कॉलेज में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे न्यायाधीश को खरी खोटी सुना देने के कारण कॉलेज की प्रिंसिपल तारिका का परमिशन लेटर फाड़ देती है। चंपक तय करता है कि वो किसी भी हाल में तारू को लंदन भेजकर रहेगा बल्कि खुद उसे लेकर जाएगा पर एयरपोर्ट पर अंग्रेजी ना आने के कारण वो मुसीबत में फंस जाता है और गलतफहमी की वजह से उसका और उसके चचेरे भाई गोपी (दीपक डोबरियाल) का पासपोर्ट रद्द हो जाता है और तारु को अकेले लंदन जाना पड़ता है। इधर चंपक और गोपी दूसरे जुगाड से लंदन पहुंचने की कोशिश करते हैं तो उधर तारु को दूसरे यंगस्टर्स को ख़ुद से काम करके अपनी पढ़ाई और दूसरे खर्चे निकालते देखना उन्हें एक तरह से आत्मनिर्भर बनाने जैसा लगता है। तारु भी पार्ट टाइम जॉब करके अपने लिए रेंट पर एक कमरा लेती है। जैसे तैसे जुगाड से लंदन पहुंचे चंपक और गोपी तारु में आए कई बदलाव महसूस करते हैं। जब तारु कहती है ये स्टूडेंट रूम है आप लोग मेरे साथ नहीं रह सकते आपको दूसरा कमरा देखना होगा तो चंपक उसे भी साथ चलने को कहता है पर वो मना कर देती है, कहती है इस रूम का रेंट मैंने मेरे पैसों से दिया है जॉब करके, मैं रिस्पॉन्सिबल होने की कोशिश कर रही हूं पापा तो इरफ़ान का बड़ा ही खूबसूरत सा डायलॉग है: पता नहीं तू रिस्पॉन्सिबल हो गई है या हमें इरेस्पोंसिब्ल समझ रही है जो अपना खर्चा खुद निकलना चाहती है, तेरा पापा अभी जिंदा है, तेरा खर्च उठा सकता है।
चंपक और गोपी चचेरे भाई हैं उनके बीच उनके परदादा घसीतेरामा के नाम का बोर्ड अपनी मिठाई की दुकान पर लगाने को लेकर आए दिन नोक झोंक होती रहती है पर जब लंदन में तारु के एडमिशन के लिए रुपयों की ज़रूरत होती है तो वही गोपी उस नाम को अपने प्रतिद्वंदी को देने के लिए तैयार हो जाता है। गोपी के किरदार में दीपक डोबरियाल ने जान डाल दी है, उनका अभिनय और संवाद अदायगी इस फ़िल्म में उनके किरदार को भूलने नहीं देगी। इसी तरह टोनी का किरदार निभाने वाले पंकज त्रिपाठी भी अपने इस हटकर किए गए किरदार के लिए हमेशा याद रहेंगे। इरफ़ान राजस्थान से ही हैं इसलिए उनकी संवाद अदायगी और प्रभावशाली बन पड़ी है। 
एक साथ बहुत सारे मैसेज देती ये फ़िल्म लाजवाब है। इस बेहतरीन फ़िल्म का निर्देशन करने के लिए होनी अदजानिया को साधुवाद। अफसोस इस बात का है कि इतनी अच्छी फ़िल्म होने के बावजूद ये फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर अच्छा व्यापार नहीं कर पाई। मुझे लगता है हमें दो मिनट रुक कर यह आंकलन करने की जरूरत है कि आखिर हमें कैसा सिनेमा चाहिए, क्या हम सेंसिबल सिनेमा को देखना भूलते जा रहे हैं? क्यूं बेहतरीन फिल्में बॉक्स ऑफिस में चल नहीं पाती? क्या हम सेंसिबल सिनेमा को देखने और उसको बढ़ावा देने के लिए आगे आएंगे?

फ़िल्म #Karwaan की समीक्षा (यादों में इरफ़ान सीरीज ...01)

फ़िल्म #Karwaan की समीक्षा (यादों में इरफ़ान... 01)

मिशन #Sendiblecinema के तहत कल (29/04/2020) इरफ़ान खान की फ़िल्म कारवां देखी। फ़िल्म का निर्देशन किया है आकर्ष खुराना ने। ज़िन्दगी एक कारवां एक सफ़र ही तो है, वो सफ़र जो कई सरप्राइजेज से भरा है, वो सफ़र जिसकी खट्टी मीठी यादें हमारे ज़हन के बक्से में ताउम्र के लिए महफूज़ हो जाती हैं अमिट कहानी सी और हमारे साथ ही जाती हैं। ज़िन्दगी का कैलकुलेशन हमेशा दो दूनी चार हो ज़रूरी नहीं, सब कुछ हमारे हिसाब से ही चले ये भी ज़रूरी नहीं। ज़िन्दगी का कारवां खूबसूरत तब ही बनता है जब हम हर लम्हे को आत्मसात करें, सफ़र का भरपूर आनंद लें, अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में तटस्थ बने रहें और सम भाव से उन परिस्थितियों के अनुरूप ख़ुद को ढाल लें। ज़िन्दगी के इस कारवां में हमें किसम किसम के किरदार मिलते हैं, कुछ अपने से लगते हैं कुछ अंजाने से, कुछ दिल के करीब मालूम पड़ते हैं तो कुछ मीलों दूर पर हमें कुछ ना कुछ सीखता हर किरदार है, कुछ हमारा हाथ थामे हमराही बनकर तो कुछ चोट और ज़खम देकर। 
इस फ़िल्म की कहानी दो दोस्तों की कहानी है जिनका सोशल स्टेटस के हिसाब से तो कोई मैच नहीं लेकिन जिनके दिल के तार एक दूसरे की फीलिंग्स के सिग्नल को बख़ूबी कैच करते हैं इसलिए एक दूसरे से बिल्कुल जुदा होने के बावजूद भी शौकत (इरफ़ान खान) और अविनाश (दुलकुयर सलमान) एक दूसरे के अच्छे दोस्त होते हैं। अविनाश बैंगलोर में एक आईटी कंपनी में काम करता है और शौकत एक वैन मालिक है और उसका गुज़ारा इस वैन के ज़रिए ही होता है। अविनाश के पास एक ट्रैवल एजेंसी से फोन आता है कि उसके पिता का एक बस एक्सिडेंट में निधन हो गया वो पास के ही एक कार्गो कंपनी से अपने पिता का पार्थिव शरीर हासिल कर सकता है। अविनाश शौकत के पास जाता है और कहता है उसे अपने पापा की बॉडी लाने के लिए शौकत की वैन चाहिए। शौकत भी अविनाश के साथ उस कार्गो कंपनी बॉडी लेने जाता है पर बॉडी गलती से एक्सचेंज हो जाती है, उनके पास किसी महिला की बॉडी पहुंच जाती है और उसके पिता की बॉडी कोच्चि उस महिला के घर। कंपनी वाले कोच्चि उस महिला के घर का नंबर देते हैं। अविनाश उस नंबर पर कॉल करता है तो वो महिला अकेले होने के कारण बैंगलोर आने में असमर्थता दिखाती है तो अविनाश स्वयं उसकी मां की बॉडी लेकर कोच्चि जाने को तैयार हो जाता है। इरफ़ान अविनाश के इस फैसले पर गुस्सा होता है कहता है रोती हुई औरत और दूध वाले पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए वो तुझे मूर्ख बना रही है और वहां बुला रही है पर दोस्त के कारण वो बॉडी लेकर कोच्चि जाने के लिए तैयार हो जाता है। वो लोग रास्ते में होते हैं कि उस महिला का फिर फोन आता है वो बीच रास्ते से अविनाश को अपनी बेटी तान्या (मिथिला पलकर) को भी साथ लाने की रिक्वेस्ट करती है। इरफ़ान भड़क उठता है और अविनाश से कहता है यार मैय्यत पर रोमांस मत कर जल्द से जल्द बॉडी पहुंचा कर वापस आएं अपन। अविनाश इरफ़ान को मानकर उसकी बेटी को उसके कॉलेज हॉस्टल लेने पहुंचता है और फिर यहां से शुरू होता है तीन लोगों का सफ़र जो एक दूसरे से बिल्कुल जुदा है। उन्हें और कहां रुकना पड़ता है और किन किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है जानने के लिए इन तीन लोगों की ज़िंदगी के इस कारवां को ज़रूर देखिए आपको बड़ा मज़ा आएगा। इरफ़ान की कॉमेडी ज़बरदस्त है। इरफ़ान एक्टिंग के एक चलते फिरते स्कूल थे ये कहना अतिशयोक्ति ना होगी। चाहे कोई गंभीर किरदार हो, रुमानी, खलनायक का या फिर कॉमिक कैरेक्टर इरफ़ान हर किरदार को बड़ी सादगी से आसानी से निभा ले जाते थे। इरफ़ान जैसे कोहिनूर को खोने की टीस दिल से कभी ना जाएगी। दुल्कुयर सलमान और मिथिला पलकर ने भी अच्छा अभिनय किया है। इस कारवां में ऐसा लगेगा मानो आप अविनाश, तान्या और शौकत के साथ आप भी उस सफ़र में हैं।

Wednesday, April 29, 2020

फ़िल्म # Natsamraat की समीक्षा

फ़िल्म #Natsamraat की समीक्षा

अपने मिशन #Sensiblecinema के तहत कल (28/04/2020)  नाना पाटेकर अभिनीत मराठी फ़िल्म #Natsamraat देखी। फ़िल्म को निर्देशित किया है स्वयं एक उम्दा अभिनेता महेश मांजरेकर ने और निर्माता  हैं स्वयं नाना पाटेकर। कहा जाता है कि सैराट के बाद अगर मराठी सिनेमा में जिस फ़िल्म की सबसे ज़्यादा चर्चा होती है और लंबे अरसे बाद कोई सैराट की जगह ले पाई तो वो यही फ़िल्म ही है। यह फ़िल्म बिना सबटाइटल मैंने मराठी में ही देखी और मैं ये स्पष्ट करना चाहती हूं कि मुझे मराठी भाषा नहीं आती। नीरज कुन्देर सीधी भइया आपने सही कहा था कि अगर वाचिक को छोड़ भी दिया जाए तो आंगिक, आहार्य और सात्विक के सहारे बगैर भाषा जाने भी 75%  फ़िल्म समझ में आ जाती है। मैं इस फ़िल्म को जितना समझ पाई आपके साथ उन्हीं अनुभवों को साझा कर रही हूं। यह फ़िल्म दर्द भरी दास्तां है उस नट सम्राट की जिसने अपनी ज़िन्दगी के चालीस वर्ष रंगमंच को दिए, जो अपने अभिनय से रंग प्रेमियों को रुलाता, हंसाता और उद्वेलित करता रहा, जो रंगमंच के अटूट मोह से रिटायरमेंट के बाद भी नहीं निकल पाता, जिसकी आसक्ति पैसे रुपयों में नहीं रिश्ते नातों में रही पर उन्ही अपनों के बीच वो गैरों की तरह रहा और जिसे अपनों से बेहतर गैरों ने समझा और उसका साथ दिया। ख़ून के रिश्ते नाते कैसे पानी हो जाते हैं वक़्त के साथ इस कड़वी सच्चाई को इस फ़िल्म में बड़े ही शानदार तरीके से दिखाया गया है। यूं तो इस फ़िल्म के हर कलाकार ने अपने किरदार को बखूबी निभाया पर जो किरदार अब तक मेरे साथ है वो है गणपत रामचंद्र बेलवलकर (नाना पाटेकर), गणपत रामचंद्र के मित्र राम भाऊ (विक्रम गोखले) और उनकी पत्नि कावेरी (मेधा मांजरेकर) का। इस फ़िल्म को देखकर आपको एहसास हो जाएगा कि क्यूं नाना पाटेकर को ज़बरदस्त अभिनेता कहा जाता है। अभिनय की बारीकियों को समझने की दृष्टि से भी इस फ़िल्म को लाजवाब फ़िल्म कहा जा सकता है।
एक संवाद है गणपत रामचंद्र और राम भाऊ के बीच का: कृष्ण और कर्ण संवाद, ये संवाद बहुत ही शानदार है। वो सीन जिसमें गणपत रामचंद्र एक पेपर में रखकर वड़ापाव खा रहे होते हैं और जब उस पेपर में कुछ लिखा देख ज़ार ज़ार रोने लगते हैं और पाव छोड़ कहीं निकल जाते है वो सीन मन को विचलित करता है और साथ ही अजीब सी बेचैनी भी पैदा करता है पर अगले सीन में जब वो किसी जर्जर हो चुके नाट्य निकेतन पहुंचते हैं और अपने पुराने दिन याद करते हैं, कहानी फ़्लैश बैक के गलियारों से गुजरती है तो कई बार आंखें नम हो जाती हैं। मन कचोटता है कि किसी ज़माने के इतने बड़े रंगकर्मी की आज ये क्या दशा हो गई है। वो अनाथों की तरह फुटपाथ पर सोता है। इस फ़िल्म में राजा का किरदार छोटा है पर दिल को छू लेता है। राजा फुटपाथ पर रहने वाला वही लड़का है जो पहले गणपत रामचंद्र की अटैची में से दारू के लिए पैसे चुराता है फिर आत्म ग्लानि के बोझ से दबकर अपनी गलती स्वीकार करता है और गणपत रामचंद्र की देख रेख अपना बाबा मान कर करता है, उन्हें समझता है, उनको नाटकों का शौक है ये जान बूट पॉलिश कर नाटक के टिकट लाता है। उसे देख लगता है बड़े बड़े महलों में रहने वाले छोटे दिलों के मालिकों से तो फुटपाथ पर रहने वाले बड़े दिल के मालिक हैं जो जस्बात को तो समझते हैं, जो गैर होकर भी अपने से लगते हैं। गणपत रामचंद्र और राम भाऊ की दोस्ती के कई संवाद और सीन भी हमें भावुक कर देते हैं।   नाना पाटेकर ने अदभुत अभिनय किया है, उनके संवाद, भाव भंगिमा दिल को छू जाते हैं। आखरी के दस मिनट में आप खुद को रोने से रोक नहीं पाएंगे। ये पहली ऐसी फ़िल्म है जिसमें नाना पाटेकर के किरदार को याद करके फ़िल्म खत्म होने के आधे घंटे बाद तक भी मैं रोती रही। यकीनन #Natsamraat एक ऐतिहासिक फ़िल्म है और ऐसी फिल्में यदा कदा ही बनती हैं।

Sunday, April 26, 2020

फ़िल्म #Paansinghtomar की समीक्षा

फ़िल्म #PaanSinghTomar  की समीक्षा

मिशन #Sensiblecinema के तहत आज (26/04/2020) एक बार फिर इरफ़ान खान अभिनीत और तिग्मांशु धूलिया द्वारा निर्देशित पान सिंह तोमर फ़िल्म देखी। ये कहानी भारतीय सेना के जवान और नेशनल एथलीट रहे पान सिंह तोमर के परिस्थितियों और भ्रष्ट व्यवस्था के कारण बागी बनने त्रासदी पूर्ण कहानी है। एक ऐसा एथलीट जिसने दुनिया में देश का नाम रोशन किया और देश के लिए ईनाम जीतकर लाया हो उसे ही पकड़ने के लिए उसके सर पर ईनाम रखा जाए भला इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है। पान सिंह तोमर (इरफ़ान खान) कहता है कैसी विडंबना है जब देश के लिए दौड़े और जीते तब कोई नाम तक नहीं जानता था आज वही पान सिंह तोमर जब बागी हो गया तो सब जानने लगे। बागी कोई शौक़ से नहीं बनता, परिस्थितियां और मजबूरी इंसान को बागी बनने पर मजबूर करती हैं। पान सिंह तोमर को हथियार उठाने पर मजबूर किया हमारी भ्रष्ट व्यवस्था ने, उसने अपने चाचा के विरूद्ध हथियार तब उठाया जब पुलिस, प्रशासन किसी ने उसकी गुहार नहीं सुनी। 
ये कहानी है उस सैनिक, नेशनल एथलीट और बागी पान सिंह तोमर की जो देश के लिए विषम से विषम परिस्थितियों, न्यूनतम सुविधाओं जैसी अनेकों बाधाओं को पार करते हुए सात बार बाधा दौड़ (स्टीपलचेस) विजेता बना लेकिन अफसोस ज़िन्दगी की दौड़ में हार गया। उसके चाचा ने उसकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था उसने पुलिस, प्रशासन से कई बार अपनी ज़मीन पाने के लिए गुहार लगाई पर हर बार उसे निराशा ही हाथ लगी ऊपर से चाचा और उसके आदमी पान सिंह के बेटे पर भी हमला करते हैं, उसकी मां को भी मारते हैं तब मजबूरन पान सिंह को बागी बनना पड़ता है। पर एक बार जिसने हथियार उठा लिया हो उसकी सामान्य ज़िन्दगी में वापसी असंभव है। कहानी फ़्लैश बैक में चलती है एक पत्रकार पान सिंह तोमर का इंटरव्यू लेने आता है, पान सिंह भी इंटरव्यू के लिए इसलिए राज़ी हो जाता है ताकि उसके बागी बनने की दास्तां मीडिया के माध्यम से जन जन तक पहुंचे। जब पत्रकार महोदय पहला ही प्रश्न दागते हैं कि आप डाकू क्यूं और कैसे बने तो वो पान सिंह भड़क उठता है कहता है हम बागी हैं, डाकू तो पार्लियामेंट में होते हैं। फिर वो अपनी आर्मी की नौकरी से लेकर नेशनल एथलीट बनने तक के सफर के बारे में पत्रकार को एक एक कर हर घटना बताता है, साथ ही बागी बनने की वजह भी स्पष्ट करता है। वो मारना पसंद करता है पर सरेंडर नहीं करता। वो कहता है सरेंडर का मतलब अपने गुनाहों को क़ुबूल करना, मैंने कोई गुनाह नहीं किया कभी किसी निर्दोष को नहीं मारा। मैं क्यूं करूं सरेंडर, ये पुलिस प्रशासन करे सरेंडर जिन्होंने मुझे बागी बनाया। 
फ़िल्म के कई संवाद बहुत ही ज़बरदस्त हैं जैसे एक सीन में जब पान सिंह के कोच उसे गाली देते हैं तो वो कहता है गुरु जी मां बहन की गाली मत देना, हमारे यहां गाली पर गोली चल जाती है और हमें हमारी मां से बहुत प्यार है। पान सिंह का एक और डायलॉग है: चंबल में दुश्मन खत्म हो जाते हैं पर दुश्मनी नहीं। पुलिस के जिन मुखबिरों को वो मारता है उनके बारे में वो पत्रकार से कहता है उन्होंने हमसे गद्दारी की, वो निहत्थे थे पर निर्दोष नहीं इसलिए उन्हें मारा। बागी होने के बावजूद भी वो संवेदनाशून्य नहीं है, उसकी गैंग का कोई बागी जब पुलिस के हाथो मारता तो वो उसके परिवावालों को भरण पोषण के लिए पैसे भेजता। वो सीन बड़ा ही मार्मिक है जहां पान सिंह अपने चाचा भैरव सिंह से बोलता है: दद्दा तुमने ऐसा क्यों किया, हमें हथियार उठाने पर मजबूर क्यूं किया, हम तो सीधे साधे खिलाड़ी थे, मेरी इस हालत के लिए ज़िम्मेदार कौन है? बुंदेलखंड से ना होने के बावजूद इरफ़ान ने बुन्देली बोलने का अच्छा प्रयास किया है। जब पत्रकार पान सिंह का इंटरव्यू ले रहा था उस वक़्त बैकग्राउंड में जो म्यूज़िक बजता है अगर आप बुंदेलखंड या बृज भाषा वाले क्षेत्र से तालुक रखते हैं तो आपको अपनी मातृभूमि की याद दिलाएगा। अंतिम सीन जिसमें पान सिंह तोमर को गोली लगती है और उसे अपने पुराने दिन याद आते हैं वो सीन दिल को बेचैन कर देता है। भिंड मुरैना की पृष्ठभूमि पर बनी, हमारी व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली इस फ़िल्म में बेहतरीन अभिनय से पान सिंह तोमर के किरदार को जीवित करने के लिए इरफ़ान हमेशा याद किए जाएंगे।

Saturday, April 25, 2020

फ़िल्म #श्वास की समीक्षा

फ़िल्म #Shwaas की समीक्षा

मिशन #Sensiblecinema के तहत आज (25/04/2020) मराठी फ़िल्म #Shwaas देखी जो 2004 में ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थी साथ ही इस फ़िल्म को 2004 का नेशनल अवॉर्ड भी मिला था। महज़ तीस लाख की लागत में तीस दिनों के भीतर बनी ये फ़िल्म भीतर से झंकझोर देती है। फ़िल्म अपने टाइटल के अनुरूप सत प्रतिशत खरी उतरती है, इस फ़िल्म को देखते हुए कई बार आपको ऐसा महसूस होगा कि सच में आपकी श्वास कहीं अटक सी गई है, आप ऑक्सीजन की ज़रूरत महसूस करेंगे। ये फ़िल्म पुणे की एक सच्ची घटना पर आधारित है। 
फ़िल्म की कहानी एक सात आठ वर्षीय बच्चे परशुराम (अश्विन चितले) के इर्दगिर्द घूमती है जिसे साफ साफ दिखाई नहीं देता और कई बार तो कोई चीज़ दो दो नज़र आती हैं। उसके आजोबा यानि दादा जी (अरुण नालावादे) उसकी आंखों की जांच कराने शहर जाते हैं तब उन्हें पता चलता है कि परशुराम को रेटिनल कैंसर है और अगर जल्द ही दोनों आंखें नहीं निकाली गईं तो कैंसर को बढ़ने से रोकना मुश्किल हो जाएगा। वो बच्चा जिसने अभी ढंग से दुनियां तक नहीं देखी, जिसकी ज़िन्दगी में अभी रंग भरने ही शुरू हुए थे कि क़िस्मत ने उन सभी रंगों को स्याह रंग में बदल देना चाहा, जो फिर कभी चांद तारे नहीं देख पाएगा, दूसरे बच्चों की तरह दौड़ भाग नहीं पाएगा, जो किसी का सहारा बनता उस नन्ही सी जान को खुद सहारे की ज़रूरत होगी ये सब सोचकर ही उसके आजोबा सिहर जाते हैं और उस बच्चे से ये बताने की हिम्मत नहीं कर पाते कि उसकी सपनीली आंखें अब कभी हसीं ख़्वाब नहीं देख देख पाएंगी। डॉक्टर साने कहते हैं बिना मरीज़ को हकीकत से रूबरू किए वो ऑपरेशन नहीं करेंगे। परशुराम के आजोबा को ये सच्चाई बतानी ही पड़ेगी और अगर उसे बचाना है तो ये फैसला जल्द से जल्द लेना होगा। उस नन्हे से बच्चे को ऑपरेशन थिएटर में जाते देखना बड़ा ही हृदय विदारक है। ऐसा लगता है ईश्वर इस बच्चे का सारा दुःख हमें दे दे और मेरे हमारे हिस्से की सारी खुशी उसके दामन में डाल दे, भगवान पर गुस्सा भी आता है कि आख़िर उस मासूम ने किसी का क्या बिगाड़ा था जिसकी इतनी बड़ी सजा उसे मिल रही है। ऑपरेशन से एक दिन पहले परशुराम बहुत ज़िद करता है, सबके ऊपर गुस्सा दिखाता है,  उसका मन बहलाने के लिए और ज़िन्दगी के कई अनदेखे रंगों से उसका परिचय कराने के लिए उसके आजोबा उसे चुपके से अस्पताल से सबकी नज़रों से बचाकर मॉल ले जाते हैं, घोड़े पे बिठाते हैं, मंदिर लेके जाते हैं, उसके उदास चेहरे पर ख़ुशी लाने की कोशिश करते हैं। इधर हॉस्पिटल में परशुराम और उसके दादा के अचानक किसी को बिना बताए गायब हो जाने से अफरातफरी मच जाती है। मीडिया और पुलिस प्रशासन तक हरकत में आ जाता है। परशुराम का मामा किसी अप्रत्याशित घटना हो जाने के डर से सिहर उठता है। डॉक्टर मिलिंद साने परेशान होते हुए अपनी कार से कहीं निकलने को होते हैं कि तभी उन्हें वो दोनों सामने से आते दिखते हैं। उस वक़्त डॉक्टर और परशुराम के दादा के बीच का संवाद बड़ा ही प्रभावशाली बन पड़ता है। पहले तो परशुराम के दादा चुपचाप डॉक्टर की बात सुनते रहते हैं पर फिर वो जो सवाल करते हैं वो डॉक्टर मिलिंद को निरुत्तर कर देते हैं साथ ही विचलित भी। पहली बार डॉक्टर होते हुए वो दिमाग़ की जगह दिल से काम लेते हैं। 
अरुण नलावादे और अश्विन चीतले का अभिनय तो उम्दा है ही, डॉक्टर के किरदार को संदीप कुलकर्णी ने भी जीवंत कर दिया है। मलयालम, बांग्ला और मराठी सिनेमा में कहानी कहने की कला बेमिसाल है। कहानी और किरदार दोनों अंत तक बांधे रखते हैं। आपको ये फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए। इस फ़िल्म को सजेस्ट करने के लिए मैं अपने मित्र डॉक्टर कैलाश यादव जी का शुक्रिया अदा करना चाहूंगी।

मालूम नहीं

क्या है क्यूं कैसी ये खलिश मालूम नहीं
नज़रों में तेरी ये कैसी कशिश मालूम नहीं
क्या खींचे मुझको तेरी ओर मालूम नहीं
है कौन सी वो अनजानी डोर मालूम नहीं।।

बच्चों सा तू निश्छल निर्मल
मुखड़े पे हंसी बहती छल छल
सोचूं तुझको, खोजूं तुझको
पाऊं तो कभी को दूं तुझको
तुझसे ये कैसा नाता है मालूम नहीं
मुझको तू क्युंकर भाता है मालूम नहीं।।

कोई ख्याल, आस या कि कोई प्यास है
है मीलों दूर फिर भी लगता आसपास है
भटकती रूह को रहती तेरी तलाश है
मिलेंगे कहीं किसी मोड़ पर इक आस है
उम्मीद क्यूं है तेरे मिलने की मालूम नहीं
क्यूं समझ नहीं कुछ आता है मालूम नहीं।।