Wednesday, December 10, 2014

भोपाल गैस त्रासदी को 30 वर्ष हो गये,न तो पीड़ितों को अब तक न्याय मिला न ही जिम्मेदार को सजा।अब तो एण्डरसन इस दुनिया से कूच भी कर गया।इसी संदर्भ में पेश हैं चंद दोहे
1
अब तो हम पर हंस रहा एण्डरसन का भूत
सजा न उसको मिली कुछ रह गये धरे सबूत
2
ताकतवर को मिली है सभी तरह की छूट
एण्डरसन आया गया धर छाती पर बूट
3
गैस त्रासदी से सबक यही मिला है खास
कुर्बानी कमजोर की मांगे सदा विकास
4
सोनभद्र का दर्द भी बहरे सुन ना पांय
बड़ी बड़ी परिययोजना बस लगती ही जांय
bhonpooo.blogspot.in

Tuesday, December 9, 2014

एक थी सिंगरौली-- 13
वर्तमान समय में रिहंद बांध का जो उपयोग हो रहा है उसे देख कर समझ में नहीं आता कि हंसा जाये या रोया जाये।दुनिया में शायद ही एेसी कोई दूसरी मिसाल मिलेगी जहां इतने बड़े जलाशय के पानी का इस्तेमाल  सिर्फ कुछ बिजलीघरों की मशीनों को ठंढ़ा करने के लिए किया जाता हो।अब तो जलाशय में पानी का स्तर कम न हो जाय इसकी वजह से बांध की टरबाइनें चालू ही नहीं की जाती हैं इसलिये जल विद्युत बनाई ही नही जाती।अब आइये इसका दुरूपयोग भी देख लिया जाय।इस लिहाज से सबसे पहले नजर जाती है जलाशय के किनारे किनारे बने विशाल राख बांधों पर जिसमें लाखों टन कोयला प्रति दिन जलने पर निकलने वाली राख को इकट्ठा किया जाता है।ताप बिजलीघरों से निकलने वाली राख में पानी मिलाकर बड़े फोर्स से मोटे मोटे लोहे के पाइपों के जरिये राख बांध में बहाया  जाता है।राख बांध में राख सूख जाने पर हवा के साथ उड़े न इसलिये इसमें राख के लेवल से ऊपर हरदम पानी भरा रहना चाहिये।कोयले की राख में तमाम जहरीले तत्व होते हैं।राख बांध का यह बड़ी मात्रा में प्रदूषित पानी रिसाव के जरिये  रिहंद जलाशय में जाता है अौर उसे भी निरंतर प्रदूषित करता रहता है।एनटीपीसी के तीन बिजलीघरों-सिंगरौली सुपर थर्मल पावरस्टेशन शक्तीनगर    विंध्याचल सुपर थर्मल पावर स्टेशन विंध्यनगर,रिहंद सुपर थर्मल पावर स्टेशन बीजपुर तथा उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड के अनपरा सुपर थर्मल पावर स्टेशन,बिड़ला के रेंणू सागर थर्मल पावर स्टेशन के राखबांध रिहंद जलाशय के किनारे ही बने हैं।कई बार राखबांध के टूटने से बहुत बड़ी मात्रा में राख सीधे बह कर रिहंद में जाती है।इसके अलावा चोरी छिपे भी राख रिहंद में बहाई जाती रही है।कुछ वर्ष पूर्व सोनभद्र आई तहलका की टीम ने इस तरह चोरी चोरी रिहंद में राख बहाए जाने की घटना की रिपोर्टिंग की थी।
      रिहंद बांध को प्रदूषित करने की होड़ में एनसीेएल की कोयला खदानें भी किसी से पीछे नहीं हैं।ये बारह कोयला खदानें भी रिहंद के इर्द गिर्द ही हैं  तथा ये सभी खुली खदानें हैं।इन खदानों से निकलने वाला  मलबा(अोवर बर्डेन),कोयले की धूल,वर्कशापों का कचरा एवं कालोनियों का जलमल रिहंद को प्रदूषित करता है।रिहंद के प्रदूषण की कहानी यहीं नहीं खत्म होती है बल्कि ताप बिजलीगरों,कोयला खदानोॆ के साथ साथ हिन्डालको अल्यूमिनियम कारखाना,कनोडिया केमिकल,हाई टेक कार्बन,इंडस्ट्रियल गैसेज जैसे कारखानों का भी रिहंद के पानी को  जहरीला बनाने में बड़ा हाथ है।
       चुर्क अौर डाला की सीमेन्ट फैक्ट्रियां,हिन्डालको,अोबरा बिजलीघर आदि बनने के साथ साथ इस इलाके की आबादी बढ़ने लगी थी।अस्सी के दशक के बाद देश के दूसरे हिस्सों  से रोजी रोटी की तलाश में इधर आने वालों की रफ्तार काफी तेज हो गई।उतनी ही तेजी से नई नई बसाहटें बसीं,पुरानी छोटी बस्तियां बड़े कस्बों में तब्दील हो गईं।अलग अलग परियोजना की अलग अलग कालोनियां,शापिंग काम्प्लेक्स बने।इस बढ़ी हुई आबादी का भी दबाव बढ़ा,छोटे बड़े उद्योग धंधे लगे।इनका कचरा भी बढ़ता गया।
   अब स्थिति यह है कि तमाम छोटे बड़े नाले-बलियरी,सौरा(सूर्या),चटका आदि तथा रेंण की सहायक नदियां-बरन,बिजुल,काचन ,मयार आदि बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी हैं अौर निरंतर अपना जहर रिहंद में डाल रही हैं।यह सब वर्षों से चल रहा है लेकिन सभी अपने अपने में मस्त हैं ,व्यस्त हैं-परियोजना अधिकारी,स्थानीय प्रशासन,प्रदेश सरकार अौर केन्द्र सरकार भी।हां,कागज पर जरूर घोड़े दौड़ाये चाते होंगे,पर्यावरण दिवस,पर्यावरण सप्ताह बहुत धूमधाम से मनाया जाता होगा अगले दिन अखबारों में बड़े बड़े बयान छपते हैं,वृक्षा रोपण करते हुए अधिकारियों की फोटो छपती हैं। बस हो गई  पर्यावरण सुरक्षा।
      - अजय
bhonpooo.blogspot in

Sunday, December 7, 2014

पेंडारी ग्राम(बिलासपुर) के नसबंदी शिविर में हुई 19 महिलाअों का मौत ने परिवार नियोजन कार्यक्रम में बरती जा रही घोर लापरवाही को उजागर कर दिया है जिससे नसबंदी शिविर यातना शिविर बन जाते हैं।इसी पर चंद पंक्तियां पेश हैं
1
प्राइवेट मंहगा बहुत सरकारी बदहाल
शिक्षा स्वास्थ्य मिले उन्हें जो हैं मालामाल
2
महिला अौर गरीब की किसे पड़ी परवाह
पूरा हो बस टारगेट रहती हरदम चाह
3
लापरवाही की नई कायम करें मिसाल
महिला नसबंदी शिविर का है एेसा हाल
bhonpooo.blogspot.in

Saturday, December 6, 2014

एक थी सिंगरौली-12
कहा जाता है रिहंद बांध परियोजना उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत का ड्रीम प्रोजेक्ट था।वह चाहते थे कि पंजाब,हरियाणा की तर्ज पर पूर्वी उत्तर प्रदेश का अौद्योगीकरण हो जिसके लिए जरुरी थी बड़े मात्रा में बिजली अौर यह काम रिहंद बांध के जरिये जल विद्युत पैदा कर किया जाना था।इसीलिए यह बांध पूर्वी उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिला में पिपरी नामक स्थान पर सोन की सहायक रेंण नदी पर बनाया गया।आज कल के बांधों की तरह यह बहुउद्देशीय बांध नहीं था।सिंचाई,पेयजल आपूर्ति आदि के लिए न होकर यह सिर्फ बिजली उत्पादन के लिए बनाया गया था।300मेगावाट विद्युत उत्पादन इसका लक्ष्य था।आज तो सिंगरौली में4000मेगावाट अौर 6000मेगावाट की विद्युत उत्पादन क्षमता वाले सुपर थर्मल पावर स्टेशन बन गये हैं लेकिन सन् 1960में 300मेगावाट भी बिजली की बड़ी मात्रा थी।रिहंद बांध से बिजली तो पैदा होने लगी थी किन्तु उस समय तक पूर्वी उत्तर प्रदेश में अौद्योगीकरण के लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट न होने के कारण इस बिजली का कोई उपयोग नहीं था।बाद में नेहरू जी की प्ररणा से उद्योगपती बिड़ला ने इस क्षेत्र में अल्युमिनियम का कारखाना हिंडालको लगाया।हिंडालको को बहुत सस्ती दर पर बिजली दी जाती थी।बाद में यहां पर कोयले की भारी उपलब्धि को देखते हुए हिंडालको के लिए रेणू सागर में ताप बिजलीघर बना लिया गया जिसकी उत्पादन क्षमता में बाद के दिनों में काफी वृद्धि की गई।
अक्सर जल विद्युत की जगह ताप विद्युत को ज्यादा पसंद किया जाता रहा जिसका एक बड़ा कारण तो यह था कि जल विद्युत का उत्पादन वर्ष भर एक सा नहीं होता है। गर्मी के दिनों में बांध में पानी का जलस्तर काफी कम हो जाता है इससे विद्युत उत्पादन प्रभावित होता है जबकी ताप विद्युत के साथ एेसी कोई समस्या नहीं होती,पूरे वर्ष एक सा उत्पादन रहता है हालांकि ताप विद्युत की सबसे बड़ी समस्या इससे पैदा होने वाला भारी प्रदूषण  है।रिहंद बांध से भी बरसात के मौसम को छोड़कर विद्युत उत्पादन क्षमता से कम होता रहा।कोयला खदानों के कारण बड़ुी मात्रा में जंगलों की कटाई से जल्द ही रिहंद के जलाशय में काफी गाद भर गई जिससे इसकी जल ग्रहण क्षमता बहुत कम हो गई है।अब तो विद्युत उत्पादन ठप्प पड़ा है।इतनी बड़ी परियोजना इतनी जल्दी बेकार हो गई,है ना आश्चर्य की बात।
      कहते हैं एक अंग्रेज अफसर जब शिकार खेलते हुए उस जगह पहुंचा जहां रेंण नदी दो ऊंची पहाड़ियों के बीच से होकर बहती है तब पहली बार उसके मन में इस स्थान पर नदी को रोक कर एक सुन्दर झील बनाने का विचार आया था उसने इंग्लैंड में इस तरह की मानव निर्मित झील देखी थी पर यह विचार अंग्रजों के समय तक क्रियान्वित नहीं हुआ शायद उन्हें इस परियोजना में खर्च के मुकाबले लाभ ज्यादा न दिखाई पड़ा हो।जनपद सोनभद्र में ही मुख्यालय राबर्ट्सगंज से कुछ दूर धंधरौल नामक स्थान पर एक छोटी सी नदी घाघर पर अंग्रेजों के समय का छोटा सा बांध बना है।एक साल गर्मियों में विजयगढ़ किले पर होने वाले सालाना उर्स में जाते हुए वह बांध देखने का अवसर मिला था।छोटा सा यह खूबसूरत बांध सन् 1913 में बनाया गया था।इस बांध के आसपास का इलाका समतल जमीन वाला है जिसकी सिंचाई इस बांध से निकाली गई नहर से आज भी हो रही है।अंग्रजों ने इस बांध को सिचाई के उद्देश्य से ही बनाया था ताकि ज्यादा भू राजस्व प्राप्त किया जा सके।देखिये एक अोर है सन्1913का बना छोटा सा धंधरौल बंधा जो आज भी खेतों की प्यास बूझा रहा है दूसरी अोर है विशाल जलराशि वाला रिहंद बांध जो खुद एक समस्या बन गया है पूरे इलाके के लिए।रिहंद का प्रदूषित जल सिंगरौली क्षेत्र के भूगर्भीय जल को प्रदूषित कर रहा है।यह बात तो सन् 1990 में ही एक महत्वपूर्ण अध्ययन में सामने आ गई थी।
          अजय
bhonpooo.blogspot.in

नेपाल में हो रहे सार्क सम्मेलन में दोनो प्रधानमंत्रियों-भारत,पाक के बीच अनबोला ही रहा,न दुआ न सलाम।इस पर चंद दोहे पेश हैं
1
कभी मिले थे लपक कर अच्छा था आगाज
दूर दूर ही अब रहें देखो नमो नवाज
2
सार्क अखाड़ा बन गया हिन्द पाक के बीच
ठुकरायें प्रस्ताव हर वे तो आंखें मीच
3
हिन्द विरोधी लहर पर रहता पाक सवार
आतंकी को हर मदद देती हर सरकार
4
जनता दोनो अोर की चाहे शान्ति विकास
सरकारों को कभी भी आया ना यह रास
bhonpooo.blogsppot.in

Wednesday, December 3, 2014

जिस तेजी से चमत्कार को नमस्कार का चलन बढ़ा है उसी रफ्तार से बाबाअों की दूकानदारी चटकी है।धर्म की जगह आडम्बर बढ़ रहा है,उसे बेनकाब होना ही है।आसाराम,रामपाल आदि तो कुछ उदाहरण भर हैं।इसी पर पेश हैं चंद दोहे
1
सरल ह्रदय वे संत हैं छल प्रपंच से दूर
प्रेम दया सेवा सदा हो जिनमे भरपूर
2
काम क्रोध मद लोध से रहे जो हरदम चूर
एेसे ढ़ोंगी से सदा रहना प्यारे दूर
3
नेता- बाबा का बना है कैसा गठजोड़
मिलजुल दोनो लूटते लाज शरम सब छोड़
4
हम भी पाना चाहते जल्दी सबकुछ आज
अपनाने से शार्टकट कब आते हैं बाज
bhonpooo.blogspot.in

Monday, December 1, 2014

एक थी सिंगरौली--11
आपने मजमेबाजों को देखा होगा किस तरह वे अपनी लच्छेदार बातों से दर्शकों को प्रभावित कर लेते हैं अौर मंजन,तेल,दवाइयां आदि बेंच कर चले जाते हैं।उनके जाने के बाद या फिर घर पहुंच कर हकीकत से दो चार होने पर पता चलता है कि हम तो ठग लिये गये।यही खेल थोड़ा अौर नफासत के साथ विकास परियोजनाअों में खेला जाता है।विकास परियोजना की प्रोजक्ट रिपोर्ट विशेषज्ञ  लोग तैयार करते हैं।प्रोजेक्ट रिपोर्ट मंजूर कर ली जाय इसके लिये लागत अौर लाभ के अनुपात को दुरुस्त रखने के लिये परियोजना से होने वाले फायदों को बढ़ा चढा कर दिखाया जाता है।एेसे एेसे सब्जबाग दिखाये जाते हैं जो कभी पूरे नहीं होते बल्कि बाद में तो येशेखचिल्लियों के सपने लगते हैं।सुनहरे भविष्य का एेसा खाका खींचा जाता है कि मानो देश की बेहतरी के लिये यह परियोजना बहुत जरुरी है वरना देश विकास की दौड़ में बहुत पीछे हो जायेगा।एक अोर तो परियोजना के फायदे बढ़ा चढ़ा कर गिनाये जाते हैं वहीं दूसरी अोर परियोजना की लागत कम कर के दिखाई जाती है।लागत के मद में कई खर्चों को जोड़ा ही नहीं जाता जबकी वे कीमतें तो किसी को चुकानी ही पड़ती हैं।अक्सर देखने में आता है कि परियोजना में पुनर्वास के मद में काफी किफायत से काम लिया जाता है।इसी प्रकार परियोजनाअों की पर्यावरणीयअौर सामाजिक कीमतें स्थानीय लोगों को ही चुकानी पड़ती हैं।
         गरज यह कि परियोजना को लाभदायक दिखाने के लिये पर्दे के पीछे बहुत सारी कवायदें की जाती हैं।इन सारी कवायदों का एक ही उद्देश्य होता है कि परियोजना मंजूर हो जाय जिससे तमाम लोगों के हित सीधे सीधे जुड़े रहते हैं।इनमें वैश्विक वित्तीय संस्थान जो परियोजना को धन उपलब्धकरातेहैं,बड़ेबड़ेकंसलटेंट,रिसर्च इंस्टीट्यूट,बड़ी कंपनियां जो टेक्नोलाजी अौर मशीनरी उपलब्ध कराती हैं,सभी शामिल हैं।इसीलिए विकास परियोजनाअों की तगड़ी लाबीइंग की जाती है जिनमें देशी अौर विदेशी ताकतों की मिली भगत रहती है।परियोजना की मंजूरी के समय गिनाये गये लाभों की असलियत का पता तो तब लगता है जब ये पूरी होकर काम करने लगती हैं लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।अक्सर देखने में अाता रहा कि ये भारी भरकम परियोजनायें घोषित क्षमता से काफी कम पर कार्य करती हैं,कभी कभी तो 40 प्रतिशत या उससे भी कम।इस खराब प्रदर्शन के लिए भी बाद में सफाई के तमाम तर्क गढ़ लिये  जाते हैं।इस तरह की विकास परियोजनाअों से होने वाली देश के संसाधनों की बरबादी,पर्यावरणीय क्षति,विस्थापन की त्रासदी के लिए आखिर कौन जिम्मेदार होगा क्योंकी परियोजना के निर्माण से जिनको मलाई काटनी थी वे तो मलाई काट कर काम पूरा होते ही बंजारों कीतरह कहीं अौर डेरा डालने चले जाते हैं।
           इस तरह की परियोजनाओं का एक उदाहरण सिंगरौली से ही देना चाहूंगा,वह है रिहंद बांध का जो गोविंद वल्लभ पंत सागर के नाम से भी जाना जाता है।सिंगरौली क्षेत्र के अौद्योगीकरण के इतिहास में रिहंद बांध एक मील के पत्थर की तरह है।सन् 1960 में रिहंद बांध के निर्माण के बाद ही यहां एक के बाद एक परियोजनायें आती गईं।उस समयदेश के लिये यह कितनी महत्वपूर्ण परियोजना थी इसका अंदाजा सिर्फ इस घटना से लगाया जा सकता है जिसे इस इलाके के प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता,दुद्धी क्षेत्र के भूतपूर्व विधायक ग्रामवासी जी ने एक मुलाकात के दौरान सुनाया था।बात उस समय की है जब रिहंद बांध के शिलान्यास के लिये प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु यहां आ रहे थे,उनके साथ कांग्रेस के अौर भी दिग्गज नेता थे।ग्रामवासी जी ने बताया कि मैं पं.कमलापति त्रिपाठी जी के बगल में बैठा था उन्होंने मुझसे कहा अरे ग्रामवासी तुम्हारी तो चांदी ही चांदी है,इतनी बड़ी परियोजना तुम्हारे क्षेत्र में लग रही है,अब तुम्हें कौन हरा सकता है,तुम्हारी सीट तो अजर अमर हो गई।पं.नेहरु जी इस इलाके के प्राकृतिक सौंदर्य से इतने प्रभावित हुए थे कि शिलान्यास के अवसर पर भाषण में उन्होंने कहा था कि आगे चलकर यह स्विटजरलैंड बनेगा।उस दौर में एेसी परियोजना के विरोध के बारे में कोई सोच भी कैसे सकता था।
         राजस्व कर्मचारियों द्वारा मुआवजा निर्धारण,वितरण,पुनर्वास-व्यवस्था आदि में की जा रही धांधलियों को लेकर लोगों में काफी असंतोष था जिसने बाद में आंदोलन का रुप भी लिया।सिंगरौली क्षेत्र(म.प्र.)के भूतपूर्व विधायक अौर समाजवादी नेता पं,श्याम कार्तिक जी ने बताया कि उस दौरान डा. राममनोहर लोहिया मिर्जापुर आये हुए थे,उन्हें जब इस बाबत जानकारी मिली तो वे यहां आये अौर आंदोलन का नेतृत्व किया।पर वह दौर पं. नेहरु का था,रिहंद का विरोध नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर रह गया।
bhonpooo.blogspot.in