Tuesday, May 5, 2015

हास्य व्यंग--- माफी किसिम किसिम की


माफी मांगना कला है या विज्ञान या दोनो है इस पर विद्वानों के बीच लम्बी बहस की काफी गुंजाइस है लेकिन इस बारे में दो राय नहीं हो सकती है कि माफी का रिश्ता मानव सभ्यता से बहुत गहरा है।माफी का आविष्कार सबसे पहले किसने ,कब, कहां किया यह रिसर्च का अच्छा टापिक हो सकता है।यह इतनी उपयोगी कला है, माफ कीजियेगा आप चाहें तो इसे विज्ञान भी कह सकते हैं, कि दुनिया की हर भाषा में इसके लिये शब्द मिल जायेंगे। माफी का समानार्थी शब्द है क्षमा और दोनो के साथ याचना का भाव है क्योंकी माफी मांगी जाती है, क्षमा याचना की जाती।आप इसके लिये अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकते क्योंकी यह आपका मौलिक अधिकार नहीं है। यह पूरी तरह से दाता की मर्जी पर होता है कि वह माफी दे या साफ इंकार कर दे। जी हां यहीं पर तो इसका कला का स्वरूप सामने आता है।यहीं पर तो आपको अपना हुनर दिखाने का मौका मिलता है कि किस तरह से आप सामने वाले को अपने आंसुओं, अपनी मीठी मीठी चिकनी चुपड़ी बातों से प्रभावित कर सकते हैं। वैसे माफी मांगने की आदर्श स्थिति यह है जब  गल्ती पर सच्चे हृदय से पश्चाताप हो। इसमें उम्र, पद, धनी-निर्धन किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होता है कोई भी किसी से माफी मांग सकता है।
           माफी का दूसरा रूप भी है जो, दूसरे देशों का तो मुझे ज्यादा पता नहीं पर अपने भारत महान में खूब प्रचलित है। मुझे विश्वास है कि कभी न कभी आपका भी पाला इससे जरूर पड़ा होगा। इसमें बिना हृदय में किसी तरह की पश्चाताप की भावना उठे और कभी कभी तो बिना किसी गल्ती के सामने वाले से हाथ जोड़कर,रोते-गिड़गिड़ाते माफी मांगनी पड़ती है। इसमें माफी मांगना विवशता होती है जबकी माफी मंगवाना अपना अधिकार समझा जाता है। बचपन में इस स्थिति से मुझे बहुत बार गुजरना पड़ा है। पिताश्री के गुस्से से हम सभी लोग थर थर कांपते थे, लंबे समय तक वे एक आदर्श तानाशाह रहे। हम सभी भाई बहन इस पर एकमत थे कि हिटलर हमारे पिताश्री की तरह ही तानाशाह रहा होगा। लिहाजा जब कभी वे जोर से डांटते तो मैं रोते रोते माफी मांगने में ही अपनी खैरियत समझता था। इसी तरह स्कूल में भी सीधा होने के कारण शरारत अगल बगल के सहपाठी करते मास्टर जी की छड़ी मुझ पर पड़ती,माफी भी मांगनी पड़ती सो अलग।
           माफी की एक और भी किस्म है जिसमें माफी देने वाले के पास माफी देने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं होता चाहे हस कर दे या रोकर यानी जिसे गांव की भाषा में कहा जाय तो गुड़वा खाए परी कनवा छेदाए परी। इसे और स्पष्ट करने के लिए यह उदाहरण काफी होगा। पुरानी बात है जाड़े के दिन थे मुहल्ले में दो-तीन लोग एक जगह बैठकर धूप ले रहे थे, ट्रांजिस्टर पर गाना बज रहा था- सैंया ले गई जिया तेरी पहली नजर.....।अचानक गाना बंद हो गया। जिसका ट्रांजिस्टर था उसने तुरंत उसे उठा कर अलग अलग दिशा में घुमाया फिर उसे ठोंका-पीटा पर बेमतलब। थोड़ी ही देर बाद उदघोषक की आवाज सुनाई पड़ी कि प्रसारण में आई गड़बड़ी के कारण आप थोड़ी देर तक हमारा प्रसारण नहीं सुन सके प्रसारण में आई रुकावट के लिए हमें खेद है। इस पर जब एक से न रहा गया तो बोल ही पड़ा- जा जा माफ कीन्हा, अब आपन ट्रांजिस्टर तो पटकब ना। सामने आय के माफी मंगते तो समझ म आवत कि माफी किन तरह की होथि। पहिले तो देतेंव एक हांथ तोरे कनटाप पर फिर य बंड़वा डंडा है न डेढ़ हाथ का जमउतेंव तोरे पोंद पर,मरतेंव दस गिनतेंव एक। तब बतउतेंव कि एका कहा जात है माफी। इसी तरह भारतीय रेल से यात्रा के दौरान भी जब यह सुनना पड़ता है कि फलां ट्रेन की 12 या 13 घंटे देरी से आने की संभावना है यात्रियों को होने वाली असुविधा के लिए खेद  है, तो घर से निकल कर रेलवे प्लेटफार्म पर ट्रेन का इंतजार कर रहे आम यात्री के पास भारतीय रेल को माफ  करने अलावा और चारा ही क्या है।
           माफी मांगना विज्ञान भी है इस बात का ज्वलंत उदाहरण केजरीवाल साहब की माफी से बढ़कर और कहां मिलेगा। आमतौर पर विज्ञान में प्रयोगशाला में किसी प्रयोग को दोहरा कर निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है। दिल्ली की प्रयोगशाला में उन्होंने भी अपना प्रयोग दोहराया कि पहले जो मन में आये सो करो जब खूब छीछालेदर होने लगे तब बालक नादान बन कर जनता से माफी मांग लो। अब देखिये आने वाले समय में इस विज्ञान में और क्या क्या तरक्की देखने को मिलती है।
....... अजय

Monday, April 27, 2015

मित्रो,
      शनिववार को नेपाल में भूकम्प से हुई भीषण तबाही की तस्वीरें दिल दहलाने वाली हैं।वहां लोग भारी कष्ट और दहशत में जी रहे हैं।खूबसूरत काठमांडू मलबे के ढ़ेर में तब्दील हो गया है।यह सब कुछ देखते ही देखते हो गया,तमाम लोग तो घरों से बाहर भी नहीं निकल पाये।कितनी बेबसी, कितनी लाचारी थी,कुछ भी करने की कोई गुंजाइश ही कहां। वर्षों पहले भूकम्प के कारण हिंद महासागर से उठी सुनामी से हुई तबाही और अब नेपाल में आये इस विनाशकारी भूकम्प जिससे भारत में भी कई राज्य प्रभावित हुए हैं, ने एक बार फिर याद दिला दिया है कि प्रकृति के सामने इंसान कितना बौना है। इंसान भले ही दूसरे ग्रह में मानव बस्तियां बसाने की तैैैयारियां कर रहा हो, धधकते, आग उगलते ज्वालामुखी के अंदर उतर कर अध्ययन करने में सक्षम हो गया हो, विज्ञान,टेक्नालाजी के सहारे चमत्कार जैसे दिखने वाले न जाने क्या क्या करतब करने लगा हो फिर भी उसका सारा ज्ञान विज्ञान अभी भी बहुत नाकाफी है। इंसान अभी भी पृथ्वी के मीलों अंदर चलने वाली हलचलों का पता लगा कर भूकम्प आने के थोड़ा पहले भी उसकी सटीक भविष्यवाणी नहीं कर पाया है। अन्यथा भूकम्प से होने वाली जनहानि को काफी हद तक रोका जा सकता है। अभी तो हमारे हाथ में आपदा के बाद राहत, बचाव के कार्य करना ही है।
          यह अच्छी खबर है कि भारत ने इस संकट की घड़ी मे नेपाल के भूकम्प पीड़ितों के लिये शीघ्र सहायता भेजी है। दुआ है कि अपने देश एवं नेपाल के सभी भूकम्प पीड़ितों को इस आघात से उबरने का हौसला मिले। 

Sunday, April 26, 2015

सामयिक दोहे----
एक ओर किसान गजेन्द्र की मौत ने राजनीति में आई संवेदनहीनता को उजागर किया है तो दूसरी ओर सरकार के आश्वासनों के बावजूद किसानों की न रुकने वाली आत्महत्याएं बता रहीं हैं कि उसे अव किसी पर भरोसा नहीं रह गया है। खेती में बढ़ती जा रही लागत ने किसानों को कर्जदार बना दिया है।घाटे की खेती करते करते किसान खेती से विमुख होरहा है। इस तरह हिन्दुस्तान में बाजार के इशारों पर कारपोरेट खेती की भूमिका तैयार हो रही है।इसी संदर्भ में हैं ये दोहे

राजनीति की रोटियां सेंक रहे सब कोय
घड़ियाली आंसू रहे कोई कोई रोय

कुछ भी करके मांग लो माफी है आसान
पाप सभी कट जायेंगे दे करके अनुदान

विपदायें कब थीं नहीं सब दिन सहा किसान
अब गिरफ्त बाजार की लेती उसकी जान

कारपोरेट कृषि के दिखें आने के आसार
बना रहा है भूमिका उसकी अब बाजार।

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Saturday, April 25, 2015

सामयिक दोहे----
लीजिए साहब,लंबी छुट्टी से ताजा दम होकर लौटते ही राहुल बाबा किसानों के झंडाबरदार बन बैठे, वहीं प्रधानमंत्री जी किसानों के हमदर्द बन उसकी भलाई के लिये भूमि अधिग्रहण बिल पास कराने पर आमादा हैं और किसान है कि उसे किसी पर भरोसा ही नहीं हो रहा है,बस आत्महत्या पर आत्महत्या किये जा रहा है।इसी संदर्भ में कुछ दोहे पेश हैं

दोनो ही दल कूटते छाती हाय किसान
दोनो ने ही कृषी का किया बड़ा नुकसान

खेती ही जब ना बचे कैसे बचे किसान
इस विकास के ब्यूह में फंसा खड़ा हैरान

खेती घाटे में रहे लाभ में कृषि व्यापार
जिम्मेदारी से नहीं बच सकती सरकार

कितनी फांकों में रहा अब तक बटा किसान
इसीलिये ठगना उसे रहा सदा आसान

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Monday, April 20, 2015

अवधी रचना......
भैंसिया पानी मा

फिर कूद भैंसिया पानी मा औंधे मुंह गिरा किसानी मा
तुम लेव मजा रजधानी मा बप्पा तुम्हार परधानी मा

मौसम की गाज गिरी हम पर आंधी पानी ओला बन कर
अच्छे दिन की जउन आस रही पल भर मा होइगै छूमंतर
सूझै न डगर एकौ हमका फंस गयेन जउन परेशानी मा
फिर कूद भैंसिया पानी मा औंधे मुंह गिरा किसानी मा

पकराय दिहिन चेक सत्तर का मारिन मुंह पर जइसे मुक्का
आफत तो बरसी ऊपर से नीचे से दिहिस शासन धक्का
मूड़े पर कर्जा है भारी कुछ बचा न अब जिनगानी मा
फिर कूद भैंसिया पानी मा औंधे मुंह गिरा किसानी मा

सबकी है नजर जमिनियै पर उद्योगपती होय या बिल्डर
सरकार का अउरौ जल्दी है लै अध्यादेश ठाढ़ सिर पर
सत्ता विपक्ष हैं एकै रंग सब धरे गोड़ बेइमानी मा
फिर कूद भैंसिया पानी मा औंधे मुंह गिरा किसानी मा

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Thursday, April 16, 2015

सामयिक दोहे----
लोकसभा की चुनावी चोट ने जनता परिवार को एकता की डगर पकड़ाई पर अभी तमाम किन्तु परन्तु पीछे पड़े हुए हैं। इसी संदर्भ में पेश हैं चंद दोहे

जनता ने इनको दिया मौका कई कई बार
ठेंगे पर जनता रही करती चीख पुकार

जायेगी जनता कहां आयेगी झखमार
इसी आस पर आ जुटा यह जनता परिवार

परिवर्तन की हवा से इनको चढ़े बुखार
राग वही ढ़पली वही वही बजावनहार

जनता की चिंता नहीं ये सत्ता के यार
इक पल में हो प्यार तो अगले पल तकरार

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Wednesday, April 15, 2015

सामयिक दोहे----
अप्रैल माह आधा बीतने को है पर आसमानी आफत है कि थमने का नाम ही नहीं ले रही है, इधर मध्य प्रदेश सरकार ने सीलिंग ऐक्ट हटा कर उद्योगों को मनमाफिक जमीन खरीदने की छूट दे कर किसानों के हाथ से जमीन छीनने का पुख्ता इंतजाम कर दिया है। केन्द्र सरकार भी फिर से भूमि अधिग्रहण अध्यादेश ला कर उद्योगों की राह आसान बनाने के लिये अड़ी हुई है।

आसमान से आपदा बरसे बन बरसात
बज्र की छाती भी नहीं सह पाती आघात

उद्योगों के लिये क्यों खेती हो कुर्बान
खेती के दम पर टिका आया हिन्दुस्तान

कृषी भूमि की लूट की छूट देत सरकार
उद्योगों के लिये अब उमड़ा ऐसा प्यार

खेतिहर हिन्दुस्तान है देखो नजर पसार
सहयोगी उद्योग हों समय की यह दरकार

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