Friday, June 26, 2015

सामयिक दोहे------ ललित भंवर

         ललित मोदी के एक के बाद एक खुलासों ने राजनीतिक गलियारे में भूचाल  ला दिया है। मंचों पर आदर्शों की दुहाई देने वाले नेतागण पर्दे के पीछे अपराधियों से गले मिलते और उनकी मदद करते दिखते हैं। इसी संदर्भ में हैं ये चंद लाइनें

ललित भंवर में फंसे हैं कैसे कैसे लोग
भूल चूक है यह नहीं ना केवल संयोग

एक एक कर खुल रही धीरे धीरे पोल
लगे वे बगलें झांकने कभी थे ऊंचे बोल

नेतानगरी एक सी भले जुदा हो नाम
बगल छिपी रहती छुरी मुंह से जपते राम

ईंधन भ्रष्टाचार का कर कर इस्तेमाल
आगे रहते रेस में होते मालामाल

ललित जाल में फंसी हैं बड़ी मछलियां आज
दस्तावेजों से खुले अब तक थे जो राज
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Wednesday, June 17, 2015

बाजार



देखता हूं जिस तरफ दिखता उधर बाजार है
करती जिसकी बंदगी दुनिया की हर सरकार है

बिक रहा इंसान खुद होकर खड़ा बाजार में
जैसे जिंदा रहने का आधार ही बाजार है

कह रहे हैं देश विकसित छोड़ सब बाजार पर
दुनिया के हर मर्ज की इक ही दवा बाजार है

बज रही बंशी उदारीकरण की देखो जिधर
अपनी धुन पर अब नचाता सभी को बाजार है

पैदा करता ख्वाहिशें यह नित नई और बेहिसाब
कैद करता ख्वाहिशों के जाल में बाजार है

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Friday, June 12, 2015

सामयिक दोहे------ दिल्ली ड्रामा



कहां तो दिल्ली की जनता सफाई कर्मचारियों की कई दिनों की हड़ताल के कारण बजबजाते कूड़े के ढ़ेरों से परेशान है, वहीं दिल्ली प्रदेश और केन्द्र की सरकारें छुट्टा सांड़ों की तरह सींगे भिड़ाए एक दूसरे को धकिया रही हैं। इसी संदर्भ में पेश हैं चंद पंक्तियां

मस्ती में दोऊ भिड़े मोदी केजरीवाल
दो पाटन के बीच में जनता है बदहाल

दोनो को बहुमत मिला मतदाता का प्यार
सेवा की फुरसत कहां जब हो मारामार

सबक सिखाने के लिए रहें सदा तैयार
चूकें ना मौका करें इक दूजे पर वार

पब्लिक भी सब देखती रखती सदा हिसाब
देना होगा एक दिन इसका इन्हें जवाब

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Monday, June 1, 2015

सामयिक दोहे-------- मैगी कांड



मंहगे प्रचार के दम पर किस तरह अमानक उत्पाद हमारी जेब और स्वास्थ्य पर डाका डाल रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण मैगी कांड के रूप में सामने आया है। इसी संदर्भ में चंद लाइनें पेश हैं

विज्ञापन के पंख पर ऊंचे उड़े बाजार
मीडिया करता चाकरी हैं दलाल सरकार

क्या मैगी क्या दूसरे लाभ ही लाभ दिखाय
मानक की धज्जी उड़े पब्लिक जाये भाड़

पैकिंग खूबसूरत रहे विज्ञापन दमदार
छा जायेगा माल गर सेलेब करें प्रचार

हीरो हरोइन करें झूठे खूब प्रचार
उनकी तो चांदी कटे इधर पड़े है मार
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Friday, May 29, 2015

कविता---- कोई यूं ही नहीं मरता


कोई यूं ही नहीं मरता
जिंदगी दांव पर नहीं रखता

बिखर जाता है पारे सा
लगाता मौत को अपने गले
होकर बहुत बेबस बहुत लाचार
जब कोई
सहारा ही नहीं मिलता
कोई यूं ही नहीं मरता

किया होगा जतन सारे
न डूबे नाव माझी ने
लड़ा होगा वह लहरों से
लिए पतवार हाथों में
हवाले लहरों के सबकुछ
कोई यूं ही नहीं करता
कोई यूं ही नहींमरता

कहे जाते बहादुर वो
निकल आए भंवर से जो
कहें कायर उन्हें कैसे
लड़े फिर भी हैं डूबे जो
सरल उपदेश देना है
कि उसमें कुछ नहीं लगता
कोई यूं ही नहीं मरता

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Sunday, May 24, 2015

सामयिक दोहे--------- बैलेंस डाइट


अभी तक तो बैलेंस डाइट का ही भूत सिर पर सवार रहता था, अब डिजिटल डाइट की भी फिक्र करनी पड़ेगी। नेट के तमाम फायदों के साथ साथ नुकसान भी कम नहीं हैं जिनसे सतर्क रहना जरूरी है खासकर बच्चों और किशोरों के बावत। इसी संदर्भ में हैं ये चंद पंक्तियां

बैलेंस डाइट के लिए अब तक थे परेशान
डिजिटल डाइट आ गया और पकड़ने कान

इंटरनेट युग सत्य है करते हम स्वीकार
खतरे भी हैं कम नहीं रहना है होशियार

साइबर क्राइम बढ़ रहा सुपरफास्ट रफ्तार
साइबर सेल बेबस हुए सरकारें लाचार

नेट की लत भी है बुरी लगे जिसे भी यार
कहे मीडियादास फिर सरल नहीं उपचार

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Tuesday, May 19, 2015

सामयिक दोहे----
इधर दिल्ली सरकार उप राज्यपाल से दो दो हाथ करने में मशगूल है, उधर दिल्ली की जनता आप के घोषणापत्र में किये गये वादों के पूरा होने का बेसब्री से इंतजार कर रही है। इसी बावत चंद दोहे पेश हैं

ध्यान हटाने के लिए करना है कुछ काम
क्यों न आओ हम करें एल जी से संग्राम

बड़े लड़इया आप हैं बात बात पर रार
इसी तरह कर जायेंगे पांच साल भी पार

जनता का दिल बड़ा है माफ करे हर बार
भागे कुर्सी छोड़ ये फिर भी बनी सरकार

दिल्ली ड्रामा देखकर जनता भी है दंग
अफसर सांसत में फंसे उड़े हैं उनके रंग

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