तन्हाई डसती है अब तो तेरे बिन
दिल से पूछो कैसे कटता है हर दिन
मैक़दे में क्यूँ न ख़ुशी तलाश करूँ
कब तक रात गुजारूं मैं तारे गिन गिन
ज़िन्दगी से तो मौत अच्छी है
कम से कम पास तो आ रही है दिन ब दिन ॥
भावना के
"दिल की कलम से "
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Thursday, July 29, 2010
Friday, July 9, 2010
ये बूँदें मुझे बच्चा बनाती हैं
ये बूंदें मुझे बच्चा बनाती हैं
ना जाने कितने यादें ताज़ा कर जाती हैं
वो कागज़ की नाव पानी में तैराना
उसके डूब जाने पे जोर जोर चिल्लाना
कॉपी के पन्नो से फिर से नाव बनाना
वो नन्हे नन्हे पैरों से पानी की गहराई नापना
ऐसा करते देख किसी बड़े का चिल्लाना
पानी गहरा है बेटा आगे ना जाना
ज़रा सी सर्दी ज़ुकाम पे माँ का रात रात भर जागना
वो माँ की डांट खाना मगर फिर भी न मानना
माँ की मार, दादी का दुलार, वो माँ से उनका कहना
"खेले देओ बहु, मारा न करो अच्छा"
दादी की शह पाके फिर से धमाचौकड़ी मचाना
क्लास बंक करके बारिश में नहाना
माँ से बहाने बनाना
बस छूट गयी थी माँ
ये बूंदें-
बचपन, स्कूल, दोस्त सबकी पिक्चर खीच जाती हैं
ये खुद तो नहीं बदलीं
मगर ज़िन्दगी में कितना कुछ बदल जाती हैं
ये बूंदें मुझे बच्चा बनाती हैं
ना जाने कितनी यादें ताज़ा कर जाती हैं
भावना के
" दिल की कलम से "
ना जाने कितने यादें ताज़ा कर जाती हैं
वो कागज़ की नाव पानी में तैराना
उसके डूब जाने पे जोर जोर चिल्लाना
कॉपी के पन्नो से फिर से नाव बनाना
वो नन्हे नन्हे पैरों से पानी की गहराई नापना
ऐसा करते देख किसी बड़े का चिल्लाना
पानी गहरा है बेटा आगे ना जाना
ज़रा सी सर्दी ज़ुकाम पे माँ का रात रात भर जागना
वो माँ की डांट खाना मगर फिर भी न मानना
माँ की मार, दादी का दुलार, वो माँ से उनका कहना
"खेले देओ बहु, मारा न करो अच्छा"
दादी की शह पाके फिर से धमाचौकड़ी मचाना
क्लास बंक करके बारिश में नहाना
माँ से बहाने बनाना
बस छूट गयी थी माँ
ये बूंदें-
बचपन, स्कूल, दोस्त सबकी पिक्चर खीच जाती हैं
ये खुद तो नहीं बदलीं
मगर ज़िन्दगी में कितना कुछ बदल जाती हैं
ये बूंदें मुझे बच्चा बनाती हैं
ना जाने कितनी यादें ताज़ा कर जाती हैं
भावना के
" दिल की कलम से "
हमारे लिए काफी था उनका एक ही इशारा
वो बोलते न थे जियादा
हम भी डरते थे उनसे
हमारे लिए काफी था उनका एक ही इशारा
कहीं जाना हो, कुछ करना हो
नहीं कह पाते थे खुद से
ऐसे में माँ ही
होती थी एक सहारा
हमारे लिए काफी था उनका एक ही इशारा
उनकी एक ही आवाज़ में उठ जाते थे हम
उनके डांटने से पहले ही आँखें हो जाती थी नम
ठोंक ठोंक कुम्हार सा
उन्होंने हमें है सवारा
हमारे लिए काफी था उनका एक ही इशारा
नासमझी में उनको पत्थर दिल समझते थे
ये न करो, वो न करो , हिटलर हम कहते थे
बड़े होके जाना
सोचना गलत था हमारा
हमारे लिए काफी था उनका एक ही इशारा
भावना के
" दिल की कलम से "
पिता के नाम पाती
हम भी डरते थे उनसे
हमारे लिए काफी था उनका एक ही इशारा
कहीं जाना हो, कुछ करना हो
नहीं कह पाते थे खुद से
ऐसे में माँ ही
होती थी एक सहारा
हमारे लिए काफी था उनका एक ही इशारा
उनकी एक ही आवाज़ में उठ जाते थे हम
उनके डांटने से पहले ही आँखें हो जाती थी नम
ठोंक ठोंक कुम्हार सा
उन्होंने हमें है सवारा
हमारे लिए काफी था उनका एक ही इशारा
नासमझी में उनको पत्थर दिल समझते थे
ये न करो, वो न करो , हिटलर हम कहते थे
बड़े होके जाना
सोचना गलत था हमारा
हमारे लिए काफी था उनका एक ही इशारा
भावना के
" दिल की कलम से "
पिता के नाम पाती
Saturday, July 3, 2010
पंचू और दिल्ली की होली
होली में गिन के पांच दिन बाकी रह गए हैं और इस त्यौहार के कारन ट्रेनों में इतनी भीड़ है की पंचू को इलाहाबाद का रेजर्वेसन ही नहीं मिलता. वो बड़ा दुखी होता है और बहन से कहता है- " ए दिदिया कौनो ट्रेन मा जगह नहीं आये? अरे हम ठाड़ होइके चले जाब(जाऊंगा), लटक के चले जाब, हमरे साथ कौनो जनाना (महिला ) तो आये नहीं. सुक्खू काका, गप्पी मओसिया सब निहारे (इंतज़ार कर रहे होंगे) होइन्हें हमका. बहुत पेट बरत है हमार ( बहुत याद आ रही है). कल जीजा के साथ खेलगांव जमुनाविहार तरफ से आवत रहा तो ढोलक ओलक बाजत रही, फाग जमा रहा. हम जीजा से कहा तनी रुक जाओ, सुन लीं जाए एक दुई फाग तो जीजा हुडुक (फटकार देना) दिहिन हमका. कहीं बिहारी लेबर हैं उनके बीच बैठोगे. सब दारू पिए होंगे. अपना नहीं तो कम से कम हमारे स्टेटस का तो ध्यान रखो."
पंचू- "ए दिदिया हमार मन हियाँ नहीं लागत आये. जीजा से कहो हमका कौनो तरह ट्रेन मा बैठाए भर दें हम पहुँच जाउब.
माया - " भैया इस बार शहर की होली भी तो मना के देखो. तुम रहते हो तो टीकू का भी मन लगा रहता है. "
पंचू- "अच्छा अब इत्ता कहती हौ तो रुक जाइत (जाता हूँ) ही. देख लीई कसत(कैसी ) होत ही दिल्ली की होली."
माया- " भैया बाजार से खोवा (मावा ) ले आओ तो कुछ गुझिया बना दें. "
पंचू- " और पापड़? आलू का पापड़, चालवल की कचहरी, चिप्स ई न बनहियो का? (ये नहीं बनोगी क्या)
माया- " पापड़ हम बना तो दें सुखायेंगे कहाँ? अपने गाँव के घर जैसे खुली छत कहाँ है यहाँ? "
पंचू- " दिदिया तुम कहाँ हियां एक दरबा मा आये के बसी हौ. न धुप मिले, न रौशनी. दिनौ मा अंधियार रहत है. "
माया- " अच्छा अब छोडो भी. तुम भी एक बार बातें शुरू करते हो तो फिर रुकने का नाम ही नहीं लेते हो. जाओ जल्दी से बाजार से सामान ले आओ, नहीं तो टीकू आ जाएगा स्कूल से तो फिर कुछ नहीं करने देगा वो. "
पंचू- " ( लिए झोला अपनी मस्ती में चला जा रहा है) ताभ्ही अचानक से कहीं से पानी से भरा एक गुब्बारा उसके चश्मे पर पड़ता है- "फचाक" . ए को आये( कौन है) . का भैया ई होली की रिहार्सर ( प्रैक्टिस ) होत ही का.अरे अबहीं तो दुई रोज बाकी है होली मा तनी गम खाओ( रुक जाओ). सड़क तो पार कर ले देओ. एक तो वैसेन दिल्ली की सड़क पार करब मुस्किल आये. हियाँ आदमी कम गाडी जिआदा देखाती हैं. तभी अचानक से पानी से भरा एक गुब्बारा एक बाईक सवार के चेहरे पे पड़ता है और उसका बैलेंस बिगड़ जाता है और वो गिर पड़ता है. कुछ लोग दौड़ते हुए आते हैं और उसे घेर लेते हैं. सड़क पे ट्रैफिक जाम. अपनी गाड़ियों से कोई नहीं उतरता सब सिर्फ कान फोडू होर्न बजाते हैं. पंचू को गुस्सा आता है पहले तो वह होर्न बजाने वालों पे चिल्लाता है -" देखाई नहीं देत एक आदमी गिर गा और तुम पाचन का आपण लाग ही( और तुम लोगों को अपनी पड़ी है)" और फिर गुस्से में उस घर की तरफ जाता है जिधर से वो गुब्बारा आया था. वहाँ पहुँच के - " ई कसत के होली आये हो(ये कैसी होली है) कौनो केर जीव लेई हौ का ( किसी की जान लोगे क्या). हाथ टूट गा ओकर. तुम्हार ई मजा मजा मा ओकर तो सजा होइगा न?' उस घर के लोग शर्मिन्दा होते हैं और पंचू से वडा करते हैं की वो आगे से ऐसी गलती नहीं करेंगे. नीचे आते ही वो लोगों से बाईक चालक के बारे में पूछता है और पता पड़ने पे की उसको अस्पताल पहुचा दिया गया है भगवान् का नाम लेके आगे बढ़ता है.
पंचू मिठाई की दुकान पर पहुच कर - " भैया एक किलो खोवा दई देओ. जब दुकानदार खोवा तौल रहा होता है वो खोवे को हाथ लगा कर देखता है और सूंघता है फटाक से बोलता है - ई तो नकली खोवा आये. एमा तुम शकरकंदी और आलू मिलाये हो न? " पंचू की बात सुनकर दुकानदार पहले तो थोडा सकपकाता है और फिर- क्या बकवास कर रहे हो पता नहीं कहाँ कहाँ से देहाती चले आते हैं नहीं लेना तो जाओ यहाँ से. पर पंचू अपनी बात पे अड़ा रहता है और उससे बहस करने लगता है. अब तो वहाँ खड़े लोगों को भी पंचू की बात पे यकीन होने लगता है. इत्तेफाक से उनमें से एक ग्राहक पत्रकार होता है वो फ़ौरन अपने चैनल वालों को खबर करता है और थोड़ी ही देर में वहाँ टीवी चैनल वालों की ओबी वैन आ जाती है और एक पत्रकार जोर जोर से उस दुकान की तरफ इशारा करता हुआ कहता है- ये दिल्ली की सबसे पुरानी मिठाई की दुकान है सोचिये जब यहाँ नकली खोवा मिल सकता है तो फिर और किस दुकानदार पे आप भरोसा करेंगे. कल कानपुर में भी एक क्विंटल नकली मावा बरामद हुआ है. टीवी चैनल के दबाव के चलते उस दुकान के मावे का सैम्पल चेक होता है और वो खोवा वाकई नकली होता है. अब तो हर चैनल पे पंचोऊ छा जाता है हर कोई उससे यही सवाल करता है की उसने नकली खोवे का पता लगाया कैसे.? वो बड़े अभिमान से कहता है हम गाँव के आदमी हैं भैया असली नकली का फरक हमें ख़ूब पता है.
पंचू के जीजा जी जब पंचू को टीवी पे देखते हैं तो पत्नी से पूछते हैं- साले साहब कहाँ हैं माया? माया- भैया खोवा लेने गए हैं क्यूँ कोई काम है क्या? विनय- " माया जल्दी आओ देखो साले साहब तो टीवी पे छाए हुए हैं. विनय मन ही मन सोचता है- " दिल्ली का हीरो तो अपना साला ही है. पंचू का एक्सक्लूसिव इन्तार्विव तो अब हम लेंगे अपने चैनल के लिए फिर देखना टी आर पी कैसे ऊपर जाती है अपने चैनल की आज. "
पंचू के घर आते ही विनय कहता है- " क्या साले साहब आप तो छ गए पूरी दिल्ली में.
पंचू- " जीजा वो दुकानदार नकली खोवा बचत रहा तो पकडाए दिया सरऊ का "
विनय- " बहुत बढ़िया किया आपने. अब जियादा वक़्त मत बर्वाद करो जल्दी से अपनी सबसे पुरानी धोती और थोड़ी फटी पुरानी बनियान पहन लो आपको मेरे साथ इन्तार्विव के लिए मेरे स्टूडियो चलना है पूरा देश आपको देखेगा.
पंचू- " ए जीजा सब देखियेहें हमका तो नायका वाला कपडा पहिने देओ नहीं तो मनग्रहोनी मा सब कईहें की देखो कैसे बनके टीवी मा आयित थी हम."
विनय- " अरे साले साहब आपकी किसी की बरात में थोड़े ही जा रहे हो इस सिचुएसन के लिए आपको वसे ही तैयार होना है जैसे मैंने कहा आपको. तुमको गाँव का हीरो हीरा लाल दिखाना है मुझे समझे.
पंचू- " अब तुम कहत हौ तो ठीक है होई, इत्ते बड़े पत्रकार हौ गलत थोड़े बोलिहौ?"
विनय बड़ी शान से पंचू को लेके अपने चैनल के स्टूडियो पहुचता है. पंचू के चेहरे से लगभग सभी लोग वाकिफ हो गए थे अब तक पर एक्सक्लूसिव इन्तार्विव अब तक किसी ने नहीं चलाया था क्यूँ की पंचू कैमरा देख के घबरा गया इसलिए जल्दी ही भाग आया था अपने घर.
एक पत्रकार ने विनय से पुछ्हा सर कहाँ से ले आये आप इन्हें और अभी तो ये कितने खुश हैं दुसरे चैनल पे तो ये बड़े घबराए हुए दिख रहे थे. हर चैनल वालों को इनकी ही तलाश है. आपको ये कहाँ मिल गए.
पंचू- " (बड़े गर्व से छाती चौड़ी करके बोलने ही वाला होता है ) ई हमार जी ....................
उतने में खटाक से विनय बोलता है -ये ये हमारे गाँव के ही रहने वाले हैं किसी काम से दिल्ली आये थे. घर पे कोई नौकर था नहीं उस वक़्त तो माया ने इन्हें बाजार खोवा लाने भेजा था और बाकि का किस्सा तो आप जानते ही हैं...............
पंचू ने आश्चर्य से विनय को देखा और फिर उसके चेहरे पे एक व्यंगात्मक मुस्कराहट आ गयी....................................
भावना के
"दिल की कलम से "
पंचू- "ए दिदिया हमार मन हियाँ नहीं लागत आये. जीजा से कहो हमका कौनो तरह ट्रेन मा बैठाए भर दें हम पहुँच जाउब.
माया - " भैया इस बार शहर की होली भी तो मना के देखो. तुम रहते हो तो टीकू का भी मन लगा रहता है. "
पंचू- "अच्छा अब इत्ता कहती हौ तो रुक जाइत (जाता हूँ) ही. देख लीई कसत(कैसी ) होत ही दिल्ली की होली."
माया- " भैया बाजार से खोवा (मावा ) ले आओ तो कुछ गुझिया बना दें. "
पंचू- " और पापड़? आलू का पापड़, चालवल की कचहरी, चिप्स ई न बनहियो का? (ये नहीं बनोगी क्या)
माया- " पापड़ हम बना तो दें सुखायेंगे कहाँ? अपने गाँव के घर जैसे खुली छत कहाँ है यहाँ? "
पंचू- " दिदिया तुम कहाँ हियां एक दरबा मा आये के बसी हौ. न धुप मिले, न रौशनी. दिनौ मा अंधियार रहत है. "
माया- " अच्छा अब छोडो भी. तुम भी एक बार बातें शुरू करते हो तो फिर रुकने का नाम ही नहीं लेते हो. जाओ जल्दी से बाजार से सामान ले आओ, नहीं तो टीकू आ जाएगा स्कूल से तो फिर कुछ नहीं करने देगा वो. "
पंचू- " ( लिए झोला अपनी मस्ती में चला जा रहा है) ताभ्ही अचानक से कहीं से पानी से भरा एक गुब्बारा उसके चश्मे पर पड़ता है- "फचाक" . ए को आये( कौन है) . का भैया ई होली की रिहार्सर ( प्रैक्टिस ) होत ही का.अरे अबहीं तो दुई रोज बाकी है होली मा तनी गम खाओ( रुक जाओ). सड़क तो पार कर ले देओ. एक तो वैसेन दिल्ली की सड़क पार करब मुस्किल आये. हियाँ आदमी कम गाडी जिआदा देखाती हैं. तभी अचानक से पानी से भरा एक गुब्बारा एक बाईक सवार के चेहरे पे पड़ता है और उसका बैलेंस बिगड़ जाता है और वो गिर पड़ता है. कुछ लोग दौड़ते हुए आते हैं और उसे घेर लेते हैं. सड़क पे ट्रैफिक जाम. अपनी गाड़ियों से कोई नहीं उतरता सब सिर्फ कान फोडू होर्न बजाते हैं. पंचू को गुस्सा आता है पहले तो वह होर्न बजाने वालों पे चिल्लाता है -" देखाई नहीं देत एक आदमी गिर गा और तुम पाचन का आपण लाग ही( और तुम लोगों को अपनी पड़ी है)" और फिर गुस्से में उस घर की तरफ जाता है जिधर से वो गुब्बारा आया था. वहाँ पहुँच के - " ई कसत के होली आये हो(ये कैसी होली है) कौनो केर जीव लेई हौ का ( किसी की जान लोगे क्या). हाथ टूट गा ओकर. तुम्हार ई मजा मजा मा ओकर तो सजा होइगा न?' उस घर के लोग शर्मिन्दा होते हैं और पंचू से वडा करते हैं की वो आगे से ऐसी गलती नहीं करेंगे. नीचे आते ही वो लोगों से बाईक चालक के बारे में पूछता है और पता पड़ने पे की उसको अस्पताल पहुचा दिया गया है भगवान् का नाम लेके आगे बढ़ता है.
पंचू मिठाई की दुकान पर पहुच कर - " भैया एक किलो खोवा दई देओ. जब दुकानदार खोवा तौल रहा होता है वो खोवे को हाथ लगा कर देखता है और सूंघता है फटाक से बोलता है - ई तो नकली खोवा आये. एमा तुम शकरकंदी और आलू मिलाये हो न? " पंचू की बात सुनकर दुकानदार पहले तो थोडा सकपकाता है और फिर- क्या बकवास कर रहे हो पता नहीं कहाँ कहाँ से देहाती चले आते हैं नहीं लेना तो जाओ यहाँ से. पर पंचू अपनी बात पे अड़ा रहता है और उससे बहस करने लगता है. अब तो वहाँ खड़े लोगों को भी पंचू की बात पे यकीन होने लगता है. इत्तेफाक से उनमें से एक ग्राहक पत्रकार होता है वो फ़ौरन अपने चैनल वालों को खबर करता है और थोड़ी ही देर में वहाँ टीवी चैनल वालों की ओबी वैन आ जाती है और एक पत्रकार जोर जोर से उस दुकान की तरफ इशारा करता हुआ कहता है- ये दिल्ली की सबसे पुरानी मिठाई की दुकान है सोचिये जब यहाँ नकली खोवा मिल सकता है तो फिर और किस दुकानदार पे आप भरोसा करेंगे. कल कानपुर में भी एक क्विंटल नकली मावा बरामद हुआ है. टीवी चैनल के दबाव के चलते उस दुकान के मावे का सैम्पल चेक होता है और वो खोवा वाकई नकली होता है. अब तो हर चैनल पे पंचोऊ छा जाता है हर कोई उससे यही सवाल करता है की उसने नकली खोवे का पता लगाया कैसे.? वो बड़े अभिमान से कहता है हम गाँव के आदमी हैं भैया असली नकली का फरक हमें ख़ूब पता है.
पंचू के जीजा जी जब पंचू को टीवी पे देखते हैं तो पत्नी से पूछते हैं- साले साहब कहाँ हैं माया? माया- भैया खोवा लेने गए हैं क्यूँ कोई काम है क्या? विनय- " माया जल्दी आओ देखो साले साहब तो टीवी पे छाए हुए हैं. विनय मन ही मन सोचता है- " दिल्ली का हीरो तो अपना साला ही है. पंचू का एक्सक्लूसिव इन्तार्विव तो अब हम लेंगे अपने चैनल के लिए फिर देखना टी आर पी कैसे ऊपर जाती है अपने चैनल की आज. "
पंचू के घर आते ही विनय कहता है- " क्या साले साहब आप तो छ गए पूरी दिल्ली में.
पंचू- " जीजा वो दुकानदार नकली खोवा बचत रहा तो पकडाए दिया सरऊ का "
विनय- " बहुत बढ़िया किया आपने. अब जियादा वक़्त मत बर्वाद करो जल्दी से अपनी सबसे पुरानी धोती और थोड़ी फटी पुरानी बनियान पहन लो आपको मेरे साथ इन्तार्विव के लिए मेरे स्टूडियो चलना है पूरा देश आपको देखेगा.
पंचू- " ए जीजा सब देखियेहें हमका तो नायका वाला कपडा पहिने देओ नहीं तो मनग्रहोनी मा सब कईहें की देखो कैसे बनके टीवी मा आयित थी हम."
विनय- " अरे साले साहब आपकी किसी की बरात में थोड़े ही जा रहे हो इस सिचुएसन के लिए आपको वसे ही तैयार होना है जैसे मैंने कहा आपको. तुमको गाँव का हीरो हीरा लाल दिखाना है मुझे समझे.
पंचू- " अब तुम कहत हौ तो ठीक है होई, इत्ते बड़े पत्रकार हौ गलत थोड़े बोलिहौ?"
विनय बड़ी शान से पंचू को लेके अपने चैनल के स्टूडियो पहुचता है. पंचू के चेहरे से लगभग सभी लोग वाकिफ हो गए थे अब तक पर एक्सक्लूसिव इन्तार्विव अब तक किसी ने नहीं चलाया था क्यूँ की पंचू कैमरा देख के घबरा गया इसलिए जल्दी ही भाग आया था अपने घर.
एक पत्रकार ने विनय से पुछ्हा सर कहाँ से ले आये आप इन्हें और अभी तो ये कितने खुश हैं दुसरे चैनल पे तो ये बड़े घबराए हुए दिख रहे थे. हर चैनल वालों को इनकी ही तलाश है. आपको ये कहाँ मिल गए.
पंचू- " (बड़े गर्व से छाती चौड़ी करके बोलने ही वाला होता है ) ई हमार जी ....................
उतने में खटाक से विनय बोलता है -ये ये हमारे गाँव के ही रहने वाले हैं किसी काम से दिल्ली आये थे. घर पे कोई नौकर था नहीं उस वक़्त तो माया ने इन्हें बाजार खोवा लाने भेजा था और बाकि का किस्सा तो आप जानते ही हैं...............
पंचू ने आश्चर्य से विनय को देखा और फिर उसके चेहरे पे एक व्यंगात्मक मुस्कराहट आ गयी....................................
भावना के
"दिल की कलम से "
पंचू का घोड़ा
पंचू अखबार में लीन था की तभी भांजे टीकू के रोने की आवाज़ आती है - "मिम्मी मैं स्तूल नहीं दाउन्दा नीनू आ लही है"। पंचू के बहन माया गुस्सा करते हुए-नहीं बेटा स्कूल मिस करने वाले बच्चे गंदे होते हैं। आज आपको गीता मैम नयी पोयम सिखाएंगी न और नया वर्ड भी तो सीखना है ना सी फॉर "कैट" मियाऊँ" और अगर आप स्कूल नहीं जाओगे तो कैट आपका सारा दूधू पी जाएगी फिर टीकू बाबा स्ट्रोंग कैसे बनेगा सुपरमैन की तरह? सूपरमैन का नाम सुनते ही टीकू आँखों में नींद भरे उठता है। माया उसे जल्दी से ब्रश कराते ही स्कूल ड्रेस पहनाती है की तभी स्कूल का ऑटो आ जाता है, ड्राईवर लगातार होर्न बजाता है। टीकू दूध नहीं पीता, माया उसके पीछे पीछे दौड़ती है -टीकू जल्दी से दूधू पियो , ऑटो वाले अंकल आ गए हैं बेटा. टीकू - दूधू गन्दा है, मनु भी नहीं पीता. उसकी मिम्मी चौकलेट देती है मै भी चौकलेट खाउन्दा, मै स्कूल नहीं जाउन्दा, वो जोर जोर से रोने लगता है. पंचू से उस ढाई साल के नन्हे से बच्चे का रोना नहीं देखा जाता और वो अपनी बहन से बोलता है - ''ए दिदिया लाला का मन नहीं आये स्कूल जाए का रहे देओ, कहे रोआये पड़ी हौ? एक दिन स्कूल ना जाई तो कवन आसमान फाट पड़ी. या कवन पढाई आये की कसाई हस (की तरह) लाला के पीछे पड़ी हौ. हमार लाला बहुत समझदार हैं, आखिर लाला पूरे दिन खेल खेल मा घरौ मा तो पढते रहत हैं. इत्ते छोट हैं और इत्ता जानत हैं की हमहूँ नहीं जनतें . चिड़िया, कऊआ, मुर्गी सब चीन्हत (पहचानता है) हैं. केत्ता तो गाना सुनावत हैं. तनी(थोडा) और बड़े होए देओ तब बस्ता(बैग) पकडाओ. स्कूल नहीं अच्छा लागत उनका. कल बतावत रहे की कौनो फ़रीन मैडम हैं कल लाला से कुछ बिगड़ गा रहा तो बहुत डाटें लाला का. हमार मानो तो दुई तीन साल अबै तुम इनका घर मा पढाओ और खेले कूड़े देओ. आओ लाला हिया आओ, चलो चली खेले. हम बन जाई घोडा तुम हमरे ऊपर करो सवारी. उधर माया के हसबैंड की आवाज़ आती है- क्या कर रही हो, कितनी देर से ड्राईवर होर्न बजा रहा है, सुनाई नहीं देता? कहाँ है टीकू? माया - वो ना तो दूध पी रहा है और न स्कूल जाने को तैयार है, कहता है मामा के साथ घोडा घोडा खेलूंगा, मै क्या करून? " हसबैंड वो तो बच्चा है तुम तो बच्ची नहीं हो न ? रिपोर्ट कार्ड नहीं देखा पड़ोस के मनु से कितना पिछड़ गया है इस बार?"
पंचू - " अरे जीजा ई नन्ही सी जान और इत्ता बोझ. अरे ई खेले खाए की उमिर (उम्र) आये,अबे आणखी मा नींद भरी है. भाई हमसे ई अतियाचार नहीं देखा देख जात. जब देखो तब लड़का के पीछे डंडा लईके ठाड़ (खड़े) रहत हौ. ना खेले पावे, न सोवे पावे, ना खाए पावे. ई पढाई आये की सजा? "
जीजा- "पंचू बाबू ये दिल्ली है दिल्ली. तुम्हारा गाँव मनग्रहोनी नहीं है की हुआ सवेरा और गुल्ली डंडा लेके निकल गए खेलने. यहाँ कितना खर्च करना पड़ता है पढाई में कुछ पता है आपको? स्कूल फीस, एक्टिविटी फीस, टूर ट्रिप फीस, टियुशन फीस कचुम्बर निकल जाता है अच्छे अच्छों का . आपके यहाँ क्या बस सरकारी स्कूल में हांक दिया और छुट्टी और सरकारी स्कूलों में भी कोई पढाई होती है क्या? अगर आप भी अंग्रेजी मीडियम में पढ़े होते तो आज मनग्रहोनी में हल नहीं जोत रहे होते बल्कि दिल्ली या बम्बई जैसे शहर में मेरी तरह नौकरी करते होते. ज़रा बताईये तो आपके गाँव के कितने लड़के डॉक्टर या इंजीनिअर हैं? "
पंचू- " जीजा गोस्सात ( गुस्सा क्यूँ करते हो) कहे हौ हमसे लाला का रोब (रोना ) नहीं देखगा तो हम कही दिया."
माया- " अरे आप जीजा साले क्यूँ लड़ रहे हो, चलो चलके टीवी देखो. अब सरकार ने भी चार साल से कम उम्र के बच्चों को स्कूल भेजने पे रोक लगा दी है. अब हमारा टीकू की डेढ़ साल तक खेलने कूदने की छुट्टी. माया (हँसते और पति की चुटकी लेते हुए) देखा जीत हमारे भैया की ही हुयी."
पंचू- एक बार अपनी दीदी और जीजा की तरफ देख के मुस्कुराता है और फिर भांजे को बुलाते हुए कहता है-" आओ आओ लाला आओ चलो घोडा घोडा खेली.......लकड़ी की काठी, काठी का घोडा ...................
भावना के
"दिल की कलम से"
पंचू - " अरे जीजा ई नन्ही सी जान और इत्ता बोझ. अरे ई खेले खाए की उमिर (उम्र) आये,अबे आणखी मा नींद भरी है. भाई हमसे ई अतियाचार नहीं देखा देख जात. जब देखो तब लड़का के पीछे डंडा लईके ठाड़ (खड़े) रहत हौ. ना खेले पावे, न सोवे पावे, ना खाए पावे. ई पढाई आये की सजा? "
जीजा- "पंचू बाबू ये दिल्ली है दिल्ली. तुम्हारा गाँव मनग्रहोनी नहीं है की हुआ सवेरा और गुल्ली डंडा लेके निकल गए खेलने. यहाँ कितना खर्च करना पड़ता है पढाई में कुछ पता है आपको? स्कूल फीस, एक्टिविटी फीस, टूर ट्रिप फीस, टियुशन फीस कचुम्बर निकल जाता है अच्छे अच्छों का . आपके यहाँ क्या बस सरकारी स्कूल में हांक दिया और छुट्टी और सरकारी स्कूलों में भी कोई पढाई होती है क्या? अगर आप भी अंग्रेजी मीडियम में पढ़े होते तो आज मनग्रहोनी में हल नहीं जोत रहे होते बल्कि दिल्ली या बम्बई जैसे शहर में मेरी तरह नौकरी करते होते. ज़रा बताईये तो आपके गाँव के कितने लड़के डॉक्टर या इंजीनिअर हैं? "
पंचू- " जीजा गोस्सात ( गुस्सा क्यूँ करते हो) कहे हौ हमसे लाला का रोब (रोना ) नहीं देखगा तो हम कही दिया."
माया- " अरे आप जीजा साले क्यूँ लड़ रहे हो, चलो चलके टीवी देखो. अब सरकार ने भी चार साल से कम उम्र के बच्चों को स्कूल भेजने पे रोक लगा दी है. अब हमारा टीकू की डेढ़ साल तक खेलने कूदने की छुट्टी. माया (हँसते और पति की चुटकी लेते हुए) देखा जीत हमारे भैया की ही हुयी."
पंचू- एक बार अपनी दीदी और जीजा की तरफ देख के मुस्कुराता है और फिर भांजे को बुलाते हुए कहता है-" आओ आओ लाला आओ चलो घोडा घोडा खेली.......लकड़ी की काठी, काठी का घोडा ...................
भावना के
"दिल की कलम से"
जहां मुस्कुराता है बचपन दादी माँ के साथ
"मैं बला होते दागतर बनूँगा और गलीब लोदों की मदद तरुन्दा उनको दवाई दून्दा और उनको ठीक तर दून्दा" यह चाहत है कक्षा एक में पढने वाले विशाल की जिसकी परवरिश "मानव सेवा ट्रस्ट" इंदौर में हो रही है। विशाल को यहाँ आये तीन बरस हो गए हैं। माँ जब से छोड़ के गयी तब से एक बार भी देखने नहीं आई। विशाल के पिता की मौत इलाज के अभाव में हुयी थी यह बात ट्रस्ट वालों ने ही उसे बतायी थी तभी से वो डॉक्टर बनना चाहता है ताकि उसके पिता की तरह किसी और के पिता का साया उसके सर से ना उठे। विशाल की माँ ने दूसरी शादी कर ली इसलिए अब वो चाह कर भी विशाल से मिलने नहीं आ सकती डरती है की कहीं दुसरे पति को पता चला और उसने उसे छोड़ दिया तो क्या होगा? विशाल की परवरिश तो ट्रस्ट में अच्छी खासी हो ही रही है शायद इतने अच्छे से तो उसका पालन पोषण वो भी न कर पाती पर ट्रस्ट में उसके लिए तो जगह भी नहीं क्यूंकि वहाँ या तो अनाथ और गरीब बच्चे रहते हैं या फिर बुज़ुर्ग महिलाएं और वो अभी बुज़ुर्ग महिलाओं की श्रेणी में नहीं आती इसलिए शायद उसे अपनी ज़िन्दगी में इतना कड़ा फैसला लेना पड़ा होगा वरना कौन माँ ख़ुशी से अपने बच्चे को खुद से जुदा करना चाहेगी ? सबके माँ बाप घर परिवार में से कोई न कोई बच्चों से मिलने ज़रूर आता है पर विशाल का तो माँ के सिवा कोई और था ही नहीं। जब दुसरे लोगों और बच्चों से मिलने आते हैं और उसे मिलने कोई नहीं आता तो वह बड़ा उदास हो जाता है किसी से कहता तो कुछ नहीं लेकिन चुप सा हो जाता है। मानव सेवा ट्रस्ट में विशाल जैसे पचीस बच्चे और हैं जिनकी अलग अलग कहानी है। चार साल से सात साल तक के बच्चों को इस ट्रस्ट में लिया जाता है और वो जब तक पढना चाहें उनके पढाई का पूरा खर्च ट्रस्ट उठाता है। ८६ साल की रुकमा अम्मा इस ट्रस्ट के सब बच्चों की जान है जो यहाँ तेरह साल से हैं। किसी भी बच्चे की पैंट शर्ट फट गयी हो बटन टूट गयी हो, वो बीमार हो गया हो रुकमा अम्मा सब ठीक कर देती है और हमेशा मुस्कुराती रहती है। इस ट्रस्ट में रुकमा अम्मा की तरह ८-१० बुज़ुर्ग महिलायें है जिनका वक़्त इन बच्चों के साथ हँसते मुस्कुराते उनको कहानिया सुनाते कैसे कट जाता है पता ही नहीं चलता।
Wednesday, June 30, 2010
इस दिल में जो है उसे खबर ही नहीं
इस दिल में जो है उसे खबर ही नहीं
और अपना उसके बिन गुज़र बसर ही नहीं
बेशक ज़िन्दगी तू खाबों सी खूबसूरत हो
पर उसके बिन हम भी तेरे रहगुज़र ही नहीं
भावना के
"दिल की कलम से "
और अपना उसके बिन गुज़र बसर ही नहीं
बेशक ज़िन्दगी तू खाबों सी खूबसूरत हो
पर उसके बिन हम भी तेरे रहगुज़र ही नहीं
भावना के
"दिल की कलम से "
Thursday, June 24, 2010
आईना हैं तेरी आँखें
आईना हैं तेरी आँखें, सब खुद बयाँ कर देती हैं
तू लाख छुपा कुछ मुझसे, ये तो सच कह देती हैं
दिल का दर्द बता देती हैं, खुशियाँ भी छलका देती हैं
तेरी आँखें आंसुओं से भी तस्वीर बना देती हैं
भावना के
"दिल की कलम से"
तू लाख छुपा कुछ मुझसे, ये तो सच कह देती हैं
दिल का दर्द बता देती हैं, खुशियाँ भी छलका देती हैं
तेरी आँखें आंसुओं से भी तस्वीर बना देती हैं
भावना के
"दिल की कलम से"
Wednesday, June 23, 2010
क्या से क्या हो गयी मोहब्बत
कहीं सुना था -
"कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता"
सुना तो ये भी है -
लेके मजबूरी का सहारा
कर लो धीरे से किनारा
अब कहाँ हीर कहाँ राँझा है
मोहब्बत का उलझा सा मांझा है
प्यार करने वाले अब मरते नहीं
एक दिल में जियादा ठहरते नहीं
प्यार है एक खेल , हम तुम खिलाड़ी हैं
जो मारा नहीं दाव तो समझो अनाडी हैं
भावना के
" दिल की कलम से "
"कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता"
सुना तो ये भी है -
लेके मजबूरी का सहारा
कर लो धीरे से किनारा
अब कहाँ हीर कहाँ राँझा है
मोहब्बत का उलझा सा मांझा है
प्यार करने वाले अब मरते नहीं
एक दिल में जियादा ठहरते नहीं
प्यार है एक खेल , हम तुम खिलाड़ी हैं
जो मारा नहीं दाव तो समझो अनाडी हैं
भावना के
" दिल की कलम से "
दुनिया को बदलते देखा है
वक़्त के साथ दुनिया को बदलते देखा है
मौका आने पे अच्छे अच्छों को पलटते देखा है
किये वादों से अपनों को मुकरते देखा है
हमराही को हमने अपनी राह बदलते देखा है
मौका आने पे अच्छे अच्छों को पलटते देखा है
किये वादों से अपनों को मुकरते देखा है
हमराही को हमने अपनी राह बदलते देखा है
Tuesday, June 22, 2010
जिसकी खातिर
जिसकी खातिर हम ये सारी दुनिया छोड़ के आये हैं
उन्होंने ही अब मुह मोड़ा है हमसे हुए पराये हैं
उन्होंने ही अब मुह मोड़ा है हमसे हुए पराये हैं
क्यूँ देखती हैं आँखें वो सपना
क्यूँ देखती हैं आँखें वो सपना
जिसे कभी नहीं होना अपना
क्यूँ कांच की तरह टूट जाते हैं खाब
दो ना इसका जवाब
क्यूँ आ जाते हैं अश्क बिन बुलाये
अरे कोई तो हमें समझाए
क्यूँ कोई एक आस पे जिंदा रहता है
उस उम्मीद की खातिर दर्द वो सारे सहता है
मेरे भीतर है इस क्यूँ की टीस
जवाब मिले तो मुझे भी देना प्लीज़
भावना
जिसे कभी नहीं होना अपना
क्यूँ कांच की तरह टूट जाते हैं खाब
दो ना इसका जवाब
क्यूँ आ जाते हैं अश्क बिन बुलाये
अरे कोई तो हमें समझाए
क्यूँ कोई एक आस पे जिंदा रहता है
उस उम्मीद की खातिर दर्द वो सारे सहता है
मेरे भीतर है इस क्यूँ की टीस
जवाब मिले तो मुझे भी देना प्लीज़
भावना
दिल से तो मिल
हस्ते हुए चेहरे रोते हुए दिल
गाहे-बगाहे ही सही दिल से तो मिल
जानता है तू भी
झूट छुपाये नहीं छुपता
सच दबाये नहीं दबता
कमबख्त आईना होता है दिल
तारीफों के पुल तो बांध लेता है हर कोई
जगाये वो प्रतिभा जो तेरे भीतर है सोई
झूठी वाह वाही तो जायेगी बहुत मिल
गाहे बगाहे ही सही दिल से तो मिल
भावना
गाहे-बगाहे ही सही दिल से तो मिल
जानता है तू भी
झूट छुपाये नहीं छुपता
सच दबाये नहीं दबता
कमबख्त आईना होता है दिल
तारीफों के पुल तो बांध लेता है हर कोई
जगाये वो प्रतिभा जो तेरे भीतर है सोई
झूठी वाह वाही तो जायेगी बहुत मिल
गाहे बगाहे ही सही दिल से तो मिल
भावना
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